सबूतों से खेल बंद—DNA जांच में लापरवाही पर पुलिस का सख्त प्रहार, अब नहीं बचेंगे आरोपी
200 से ज्यादा पुलिस अफसरों को सिखाया गया साक्ष्य संकलन का ‘साइंटिफिक सिस्टम

बिलासपुर…अपराध की जांच में छोटी-सी चूक कैसे बड़े मामलों को कमजोर कर देती है—इसी चुनौती को केंद्र में रखकर बिलासपुर रेंज में एक अहम पहल हुई। पुलिस महानिरीक्षक राम गोपाल गर्ग की पहल पर डीएनए और जैविक साक्ष्य संकलन को लेकर रेंज स्तरीय ऑनलाइन कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें जांच प्रक्रिया की कमजोरियों पर सीधे काम किया गया।
क्यों जरूरी पड़ी यह कार्यशाला?
हत्या, दुष्कर्म और गंभीर अपराधों की जांच में अक्सर साक्ष्य संकलन के दौरान प्रक्रियात्मक त्रुटियां सामने आती हैं। नतीजा—फोरेंसिक रिपोर्ट कमजोर पड़ती है और आरोपी को लाभ मिलता है। इसी कड़ी को तोड़ने के लिए यह प्रशिक्षण आयोजित किया गया, ताकि जांच जमीन पर मजबूत हो सके।
DNA—सिर्फ विज्ञान नहीं, न्याय का आधार
कार्यशाला में वैज्ञानिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि डीएनए आधुनिक न्याय प्रणाली का सबसे मजबूत आधार है। यही वह साक्ष्य है जो दोषियों को सजा दिलाने के साथ निर्दोषों को भी बचाता है। खून, लार, बाल, हड्डियां और टच डीएनए जैसे नमूनों की सही पहचान और सुरक्षित संकलन पर विस्तार से प्रशिक्षण दिया गया।
जांच की बारीकियां—कहां होती है चूक
प्रशिक्षण में बताया गया कि साक्ष्य की पैकिंग, नमी और तापमान जैसे छोटे पहलू भी जांच को प्रभावित करते हैं। प्लास्टिक की जगह कागज के बैग का उपयोग, चेन ऑफ कस्टडी का पालन और सैंपलिंग की सटीक प्रक्रिया—इन सभी बिंदुओं पर विशेष जोर दिया गया।
जमीनी अनुभव और समाधान एक साथ
कार्यशाला के दौरान पुलिस अधिकारियों ने विवेचना में आने वाली व्यावहारिक समस्याएं साझा कीं। वैज्ञानिक टीम ने मौके पर ही समाधान बताए। इससे प्रशिक्षण सिर्फ सैद्धांतिक नहीं रहा, बल्कि सीधे फील्ड से जुड़ा हुआ नजर आया।
- 200 अधिकारी जुड़े, जांच में बदलाव की उम्मीद
रेंज के सभी जिलों से करीब 200 पुलिस अधिकारी और कर्मचारी इस ऑनलाइन प्रशिक्षण में शामिल हुए। कार्यक्रम के अंत में प्रशिक्षकों को सम्मानित किया गया। साफ संकेत है—अब जांच की दिशा सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से मजबूत की जाएगी।




