‘सुशासन तिहार’ के बीच बिलासपुर शिक्षा विभाग बेनकाब—अल्पसंख्यक स्कूलों का रिकॉर्ड गायब, मुख्यमंत्री की नसीहत बना मजाक
सब-हेडलाइन: एक तरफ सरकार का ‘जवाबदेही अभियान’, दूसरी तरफ विभाग का ‘नो रिकॉर्ड’—जमीनी हकीकत ने खोली पोल

बिलासपुर…प्रदेश भर में चल रहे सुशासन तिहार के बीच बिलासपुर का जिला शिक्षा विभाग एक असहज और गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। एक तरफ गांव-गांव शिविर लग रहे हैं, अधिकारी मैदान में नजर आ रहे हैं, जवाबदेही की बात हो रही है—लेकिन दूसरी तरफ विभागीय दफ्तर से निकला एक RTI जवाब पूरे सिस्टम की पोल खोल देता है।
RTI में ‘नो रिकॉर्ड’—यही है व्यवस्था?
सूचना के अधिकार के तहत पूछा गया—जिले में कुल कितने अल्पसंख्यक स्कूल हैं, उनकी मान्यता क्या है और उनसे जुड़ी जानकारी क्या है। जवाब मिला—रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। यानी जिस विभाग के जिम्मे निगरानी है, उसके पास मूल डेटा ही नहीं। यह सिर्फ एक जवाब नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर खामी का दस्तावेज बन गया है।
जवाब या बचाव—सूचना का ‘खेल’
RTI के तहत जवाब तो दिया गया, लेकिन जिस तरीके से दिया गया उसने पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए। पत्र जन सूचना अधिकारी के नाम से जारी हुआ, और आवेदक को वही जवाब थमा दिया गया। आरोप है कि प्रक्रिया को ही ऐसा बना दिया गया कि आवेदक आगे अपील में उलझ जाए।
जमीन पर अभियान, दफ्तर में शून्य
एक ओर प्रशासन सुशासन तिहार के जरिए समस्याओं के समाधान का दावा कर रहा है, वहीं विभागीय स्तर पर बुनियादी जानकारी तक संधारित नहीं। यह अंतर साफ दिखाता है कि नीति और अमल के बीच खाई कितनी गहरी है।
सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदारी किसकी?
अगर शिक्षा विभाग के पास अल्पसंख्यक स्कूलों का रिकॉर्ड नहीं है, तो फिर यह जिम्मेदारी किसकी है? और अगर कोई जिम्मेदार नहीं, तो ये संस्थान किस आधार पर संचालित हो रहे हैं? यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सिस्टम की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है।
सख्ती के दावे बनाम जमीनी सच्चाई
प्रदेश स्तर पर लगातार लापरवाही पर कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है। बैठकें हो रही हैं, निर्देश जारी हो रहे हैं। लेकिन बिलासपुर में सामने आया यह मामला बताता है कि जमीनी स्तर पर ढर्रा अब भी नहीं बदला। सवाल यही—क्या सख्ती सिर्फ मंच तक सीमित है?
कटाक्ष भी, चेतावनी भी
अगर यही ‘सुशासन’ है, तो तस्वीर चिंताजनक है। और अगर यह अपवाद है, तो इसे तत्काल सुधारना होगा। क्योंकि सूचना छिपाने या टालने की प्रवृत्ति न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि जनता के भरोसे को भी कमजोर करती है।
नजर अब कार्रवाई पर
यह मामला अब एक RTI से आगे बढ़ चुका है। यह सरकार के उस भरोसे की परीक्षा है, जिसे वह जनता के बीच स्थापित करना चाहती है। अब देखना यह है—क्या बिलासपुर में जिम्मेदारी तय होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।





