टीईटी को लेकर शिक्षक संगठन उठा रहे यह सवाल..!

रायपुर: (मनीष जायसवाल)देश भर के प्राथमिक और मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले सरकारी स्कूलों के मास्टरों के बीच इन दिनों एक ही बात चल रही है टीईटी…! गांव के स्कूल से लेकर जिला मुख्यालय तक, हर स्टाफ रूम में यही चर्चा है। छत्तीसगढ़ हेडमास्टर फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष और शिक्षक नेता कमलेश बिसेन का कहना है कि इस पूरे मामले में कई जरूरी बातों की जमीनी सच्चाई को ठीक से देखा ही नहीं गया।
कमलेश बताते है कि असल बात एकदम सरल और सीधी है 2009 से पहले जो शिक्षक भर्ती हुए, उनके समय में टीईटी नाम की कोई अनिवार्यता थी ही नहीं..। फिर 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना आई, जो नई भर्ती के लिए थी। उसके बाद 11 फरवरी 2011 के बाद वालों पर यह लागू हुआ..। लेकिन अब 2017 के संशोधन को ऐसे घुमाकर लागू किया जा रहा है जैसे हर पुराने शिक्षक पर भी यही नियम बैठेगा..। गांव के मास्टर अब सिस्टम से सवाल कर रहे है। जब नियम हमारे आने के बाद बना, तो क्या अब नौकरी भी पीछे से छीनी जाएगी..?
कमलेश बिसेन कहते हैं, जरा एक स्कूल की स्थिति समझिए। गांव में छोटा सा प्राइमरी स्कूल है, जहां मास्टर जी 15 साल से पढ़ा रहे हैं। बच्चे उन्हें गुरुजी कहकर पुकारते हैं। अब अचानक उनसे कहा जा रहा है। पहले टीईटी पास करो, नहीं तो नौकरी खतरे में। वो मास्टर, जिसने आधी जिंदगी ब्लैकबोर्ड के सामने खड़े होकर निकाल दी, अब फिर से परीक्षा की लाइन में खड़ा हो जाए..? और वो भी तब, जब पूरे प्रदेश में 15 साल में सिर्फ 6–7 बार ही परीक्षा कराई गई..।
छत्तीसगढ़ हेडमास्टर फेडरेशन के प्रदेश उपाध्यक्ष के शिक्षक नेता निर्मल भट्टाचार्य बताते है कि हेड मास्टर लोग अब किताब से ज्यादा फार्म और नियम समझने में लगे हैं।अब रात दिन चिंता सताए जा रही है कि इस समस्या से निपटा कैसे जाए। ऐसे में रास्ता अपनी मूल मांगों को दरकिनार कर आंदोलन की राह चुनने का ही बचता है। जो राष्ट्रीय स्तर पर चार अप्रैल को दिल्ली में होने जा रहा है।
भट्टाचार्य का कहना है कि इतने सालों में विभाग ने खुद भी विभागीय परीक्षा के संबंध में गंभीरता से विचार नहीं किया। अगर टीईटी इतना जरूरी था, तो सरकार ने समय रहते साफ-साफ क्यों नहीं बताया..? क्यों नहीं पर्याप्त मौके दिए गए, और समय पर कड़ाई क्यों नहीं बरती गई..? नियम बनाना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर लागू करना जिम्मेदारी का काम है। क्या सिस्टम को यह नहीं दिखता कि इससे करीब 80 हजार शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं..?
निर्मल का बताते है कि मामला सिर्फ नौकरी का नहीं है, रिटायरमेंट का भी है। जो शिक्षक NPS में हैं, उन्हें पहले ही कम पेंशन मिल रही है..। कई लोगों को तो करीब 1000–1200 रुपये तक मिल रहा है। अगर अनिवार्य सेवानिवृत्ति होती है, तो आर्थिक हालत और बिगड़ेगी। एक तरफ परिवार, बच्चों की पढ़ाई, इलाज… दूसरी तरफ इतनी छोटी पेंशन..। यह सिर्फ नियम नहीं, किसी की पूरी जिंदगी का हिसाब है।
निर्मल कहते है गांव में जब कोई शिक्षक रिटायर होता है, तो पूरा मोहल्ला उसे सम्मान देता है..। लेकिन अब वही शिक्षक डर में जी रहा है .।कहीं अचानक से नौकरी चली गई तो क्या होगा…? कहीं ऐसा न हो कि कल का गुरुजी, कल का मजदूर बनकर रह जाए..। यह डर सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, पूरे शिक्षक समाज का है..।
निर्मल भट्टाचार्य बताते है हम समाधान की बात भी कर रहे है । पुराने संवर्ग के शिक्षकों को टीईटी से मुक्त किया जाए, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका डाले और राज्य की परिस्थितियों को सामने रखे इसके अलावा केंद्र सरकार RTE कानून में बदलाव करे..। साथ ही एक संतुलित मॉडल भी हो, जिसमें प्रशिक्षण और आसान, व्यवहारिक मूल्यांकन को साथ लेकर चला जाए न कि सिर्फ एक कठिन परीक्षा के भरोसे पूरी व्यवस्था को परखा जाए।
भट्टाचार्य का कहना है कि जिम्मेदार लोग शायद भूल रहे हैं कि शिक्षक कोई मशीन नहीं है, जिसे जब चाहा रीसेट कर दिया। वह खेत में खड़े उस पुराने पेड़ की तरह है, जो सालों से छाया दे रहा है। अब अगर उसी पेड़ से कहा जाए कि पहले फिर से बीज बनो, तभी खड़े रह सकते हो तो यह बात न जमीन समझेगी, न आसमान..!





