बिलासपुर (मनीष जायसवाल)।छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग की व्यवस्था केवल मंत्रालय और विभाग तक सीमित नहीं रहती। जिला प्रशासन भी शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षकों के युक्ति युक्तकरण से लेकर परीक्षा परिणामों की समीक्षा तक, जिला प्रशासन लगातार सक्रिय रहा है। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है, जब प्रशासनिक भूमिका और अधिकारों की सीमाएं आपस में उलझने लगती हैं। युक्ति युक्तकरण के दौरान भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला था। व्यवस्था बिगड़ी तो पूरा ठीकरा स्कूल शिक्षा विभाग पर फोड़ दिया गया। अब लगभग वैसी ही स्थिति ग्रीष्मकालीन अवकाश को लेकर बनती दिख रही है।

जानकारी के मुताबिक जिन जिलों में 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा का परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आया, वहां रिजल्ट सुधार अभियान के नाम पर शिक्षकों को गर्मी की छुट्टियों में भी स्कूल बुलाने की चर्चा है। कई जगह रिमेडियल क्लास, विशेष कोचिंग और कमजोर छात्रों के लिए अतिरिक्त पढ़ाई की तैयारी की बात सामने आ रही है।

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दिलचस्प बात यह है कि जिला शिक्षा अधिकारी भी ऐसे मामलों में खुलकर नियमों और अधिकारों की चर्चा करने से बचते दिखाई देते हैं। प्रशासनिक दबाव के सामने विभागीय अधिकारी अक्सर सहमति में ही अपनी सुरक्षा समझते हैं।

पहली नजर में यह व्यवस्था गलत भी नहीं लगती। आखिर जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है कि बच्चों की पढ़ाई सुधरे, परीक्षा परिणाम बेहतर हों और कमजोर विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता मिले। लेकिन इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

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शिक्षक भी नियमित शासकीय कर्मचारी हैं। उनकी सेवा शर्तें, कार्य अवधि और अवकाश नियमों से तय होते हैं। आज शिक्षक का काम केवल कक्षा में पढ़ाने तक का नहीं होता है। परीक्षा कार्य, मूल्यांकन, पोर्टल अपडेट, विभागीय बैठकें, प्रशिक्षण, चुनाव ड्यूटी, सर्वेक्षण और कई प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी उनके हिस्से में आती हैं। शिक्षक पूरे साल लगातार काम करने के बाद ग्रीष्मकालीन अवकाश में ही परिवार और निजी जीवन के लिए समय निकाल पाते हैं। कई लोग इसी दौरान अपने गांव जाते हैं, पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं या साल भर की थकान मिटाने के लिए परिवार सहित यात्राओं में जाते है।

शायद यही वजह है कि शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से ग्रीष्मकालीन अवकाश की परंपरा बनी हुई है। सामान्य सरकारी कार्यालयों की तरह शिक्षकों को पूरे साल नियमित दो दिन का साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता। उसकी जगह पूरे शैक्षणिक सत्र के बाद सामूहिक रूप से लंबा अवकाश दिया जाता है।

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छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग ने 22 सितंबर 2025 को जारी आदेश में शिक्षण सत्र 2025-26 के लिए 1 मई 2026 से 15 जून 2026 तक ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया था। बाद में 16 अप्रैल 2026 को भीषण गर्मी और लू को देखते हुए विद्यार्थियों के लिए अवकाश 20 अप्रैल से लागू कर दिया गया, लेकिन स्पष्ट किया गया कि यह संशोधन शिक्षकों पर लागू नहीं होगा।

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि ग्रीष्मकालीन अवकाश छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के नाम से तथा आदेशानुसार
शासन स्तर पर घोषित है, तो क्या जिला कलेक्टर केवल परीक्षा परिणाम खराब आने का हवाला देकर शिक्षकों को छुट्टियों में नियमित रूप से स्कूल बुला सकता है..?

कानूनी रूप से जिला कलेक्टर को शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने, अधिकारियों की बैठक लेने और सुधारात्मक योजना बनाने का अधिकार जरूर है। वह जिला शिक्षा अधिकारी और अन्य अधिकारियों को कमजोर विद्यार्थियों के लिए योजना तैयार करने के निर्देश भी दे सकता है। लेकिन यदि यही प्रक्रिया शिक्षकों की स्वीकृत छुट्टियों को व्यवहार में खत्म करने लगे, तब मामला केवल समीक्षा का नहीं होता है।

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में जिला कलेक्टर महत्वपूर्ण अधिकारी होता है, लेकिन वह राज्य शासन का विकल्प नहीं होता। यदि कोई अवकाश शासन स्तर पर घोषित है, तो सामान्य परिस्थितियों में जिला स्तर पर उसे समाप्त करना बहस का विषय बन सकता है।

व्यवहार में प्रशासन सीधे छुट्टी रद्द जैसे शब्दों का इस्तेमाल कम करता है। उसकी जगह रिमेडियल क्लास, विशेष अध्ययन और रिजल्ट सुधार अभियान जैसे शब्द सामने आते हैं। लेकिन यदि इन योजनाओं के तहत शिक्षकों की उपस्थिति अनिवार्य कर दी जाए, अनुपस्थिति पर कार्रवाई की चेतावनी दी जाए और नियमित रूप से स्कूल संचालन शुरू हो जाए, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर अवकाश का अर्थ क्या रह जाता है।

यही कारण है कि शिक्षक संगठन केवल अतिरिक्त कार्यभार का विरोध नहीं करते, वे सेवा नियमों और प्रतिपूरक लाभ की बात भी उठाते हैं। लंबे समय से यह व्यवस्था मानी जाती रही है कि यदि ग्रीष्मकालीन अवकाश में शिक्षकों की सेवाएं ली जाती हैं, तो उसके बदले अर्जित अवकाश जैसी सुविधा मिलनी चाहिए। शिक्षकों के बीच यह धारणा वर्षो से प्रचलित है कि अवकाश अवधि में कार्य करने पर भविष्य में अर्जित अवकाश और उसके नकदीकरण का लाभ मिलता है, जिसका सेवा पुस्तिका में उल्लेख होता है।

इसका एक आर्थिक पक्ष भी है। यदि बड़ी संख्या में शिक्षकों से अवकाश अवधि में नियमित कार्य लिया जाएगा, तो भविष्य में अर्जित अवकाश और उसके नकदीकरण का भार अंततः शासन के बजट पर ही पड़ेगा। यानी शिक्षा सुधार के नाम पर लिया गया निर्णय आगे चलकर वित्तीय दायित्व भी बन सकता है।

असल में यह पूरा विवाद सिर्फ छुट्टी का नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक सेवा के बीच संतुलन का प्रश्न है। एक ओर बच्चों की पढ़ाई और परीक्षा परिणाम सुधारने की चिंता है, तो दूसरी ओर शिक्षक का श्रम, मानसिक संतुलन और सेवा अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा सुधार जरूरी है, लेकिन सुधार की प्रक्रिया नियमों और अधिकारों की सीमा के भीतर ही चलनी चाहिए। क्योंकि किसी भी व्यवस्था में अच्छा उद्देश्य तभी टिकाऊ बनता है, जब उसके साथ संवेदनशीलता और संतुलन भी जुड़ा हो।

लेकिन सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि नियमों की जानकारी होने के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी कई बार जिला प्रशासन के सामने अपना पक्ष रखने से बचते हैं। यही मौन धीरे-धीरे शिक्षकों के भीतर असंतोष पैदा करता है। और जब किसी बड़े कर्मचारी वर्ग में असंतोष बढ़ता है, तो उसका असर केवल विभाग तक सीमित नहीं रहता, उसके राजनीतिक परिणाम भी सामने आते हैं।