सूरजपुर (मनीष जायसवाल)। छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था का शायद यह सबसे बड़ा विरोधाभास है कि सड़क से जुड़े तीन अहम विभाग तीन अलग-अलग मंत्रियों के पास हैं, लेकिन सड़क टूटने पर जवाबदेही किसी एक की तय नहीं हो पाती। लोक निर्माण मंत्री अरुण साव सड़क बनवाते हैं, परिवहन मंत्री केदार कश्यप यह सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार हैं कि सड़क पर वाहन तय मानकों के अनुसार चलें, जबकि गृह मंत्री विजय शर्मा के अधीन पुलिस और ट्रैफिक व्यवस्था उन नियमों का पालन कराती है..। तीन मंत्री, तीन विभाग और उद्देश्य एक ही सड़क सुरक्षित रहे और लंबे समय तक टिके खराब न हो। लेकिन जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़क कुछ ही महीनों में फिर मरम्मत मांगने लगे, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि आखिर जवाबदेह कौन है…?

सूरजपुर की 16 किलोमीटर लंबी रिंग रोड आज इसी बहस के केंद्र में है। साल 2025-26 में इस सड़क की बीटी पैच रिपेयरिंग पर लगभग 40 लाख रुपये खर्च किए गए। काम पूरा हुआ, लेकिन सड़क फिर उखड़ने लगी। अब उसी सड़क के सुदृढ़ीकरण और मजबूतीकरण के लिए करीब 16 करोड़ रुपये से अधिक की प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है और टेंडर की प्रक्रिया जारी है।

यहीं से मामला सड़क की मरम्मत से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही तक पहुंच जाता है। जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने नौकरशाही को तार्किक-विधिक व्यवस्था बताया था। उनका मानना था कि आधुनिक प्रशासन की सबसे बड़ी ताकत स्पष्ट जिम्मेदारी, नियमों का पालन और तकनीकी दक्षता होती है। यदि यह नियम अगर यहां प्रचलित मान लिया जाए , तो फिर यह स्थिति क्यों बन रही है कि सड़क से जुड़े तीनों विभाग मौजूद हैं, लेकिन परिणाम फिर भी संतोषजनक नहीं दिख रहा..?

यदि सड़क का निर्माण कमजोर हुआ है, तो उत्तर लोक निर्माण विभाग को देना होगा। लेकिन यदि सड़क इसलिए टूट रही है क्योंकि उस पर उसकी क्षमता से कई गुना अधिक भार लेकर वाहन दौड़ रहे हैं, तो जवाबदेही परिवहन विभाग और नियमों का पालन कराने वाली एजेंसियों तक भी जाएगी। आखिर सड़क की क्षमता इंजीनियर तय करते हैं, लेकिन उस क्षमता का पालन कौन कराता है?

लोक निर्माण विभाग का तकनीकी पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। विभाग का कहना है कि रिंग रोड पर क्षमता से अधिक भार लेकर चलने वाले भारी कोयला वाहन सड़क को समय से पहले क्षतिग्रस्त कर रहे है..। यदि यह दावा सही है, तो मामला किसी एक इंजीनियर, किसी एक ठेकेदार या किसी एक सड़क का नहीं, पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का है।

यक्ष प्रश्न यही है कि सड़कें इसलिए टूट रही हैं क्योंकि उनका निर्माण कमजोर है, या इसलिए कि उन पर उनकी क्षमता से कहीं अधिक भार डाला जा रहा है…? यदि दूसरा कारण सही है, तो कार्रवाई का दायरा सड़क बनाने वाले तक ही क्यों रहे? नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन, उन्हें चलने देने वाला तंत्र और नियम लागू कराने वाली एजेंसियां भी उतनी ही जवाबदेह क्यों नहीं दिखाई देती..?

जनता को न एक्सल लोड की जानकारी चाहिए और न इंजीनियरिंग की गणना। जनता यह भी नहीं देखती कि गलती किस विभाग की थी..! उसकी नजर में सड़क सरकार की होती है और जवाब भी सरकार से ही मांगा जाता है। यही कारण है कि यदि परिवहन व्यवस्था और प्रवर्तन तंत्र अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाते, तो उसकी राजनीतिक और प्रशासनिक कीमत सबसे पहले लोक निर्माण विभाग को चुकानी पड़ती है।

मुद्दा अब 40 लाख रुपये की पैच रिपेयरिंग का नहीं है और न ही 16 करोड़ रुपये की नई स्वीकृति का। मूल प्रश्न यह है कि क्या इस बार सड़क के साथ उस व्यवस्था में भी सुधार होगा, जो सड़क को समय से पहले तोड़ देती है..? यदि ओवरलोड वाहनों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ, विभागों के बीच जवाबदेही तय नहीं हुई और नियम फाइलों से निकलकर सड़क तक नहीं पहुंचे, तो कुछ महीने बाद फिर यही सड़क उखड़ेगी, फिर मरम्मत होगी, फिर नया टेंडर निकलेगा और फिर करोड़ों रुपये खर्च होंगे।

बदलेंगे बजट, बदलेंगे ठेके, बदलेंगी प्रशासनिक स्वीकृतियां, लेकिन यदि व्यवस्था नहीं बदली तो गड्ढों की कहानी भी नहीं बदलेगी। रिंग रोड आज डामर से अधिक छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कार्यप्रणाली की परीक्षा ले रही है। यह सड़क जितनी इंजीनियरिंग की कसौटी पर है, उससे कहीं अधिक शासन, जवाबदेही और लोक प्रशासन की कसौटी पर खड़ी दिखाई दे रही है।