बिलासपुर। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की वर्ष 2010 की ग्रुप-डी भर्ती में प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के आदेश को निरस्त कर दिया है।

चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्र और जस्टिस संतोष शर्मा की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट में लंबित अवमानना कार्यवाही और कैट में मूल आदेश के क्रियान्वयन से जुड़ी निष्पादन कार्यवाही अलग-अलग हैं।

अवमानना प्रकरण लंबित होने के आधार पर निष्पादन आवेदन का निराकरण नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कैट को मामले की नए सिरे से सुनवाई कर गुण-दोष के आधार पर फैसला करने का निर्देश दिया है।

मामला बिलासपुर के देवरीखुर्द निवासी पुष्पलता सागर चौहान से जुड़ा है। उन्होंने कैट, जबलपुर के 25 सितंबर 2026 के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पुष्पलता वर्ष 2010 में रेलवे की ग्रुप-डी भर्ती प्रक्रिया में प्रतीक्षा सूची में शामिल थीं। रेलवे ने उस समय 5,540 पदों के लिए भर्ती विज्ञापन जारी किया था।

चयनित 624 अभ्यर्थियों ने पदभार ग्रहण नहीं किया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि इन रिक्त पदों को प्रतीक्षा सूची से भरने का प्रावधान होने के बावजूद रेलवे ने पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति नहीं दी।

197 अभ्यर्थियों को सुप्रीम कोर्ट से मिल चुकी है राहत

इस भर्ती से जुड़े मामले में पहले 197 अभ्यर्थियों ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में याचिकाएं दायर की थीं, लेकिन उन्हें वहां राहत नहीं मिली।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। दिनेश कुमार कश्यप एवं अन्य बनाम दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 27 दिसंबर 2018 को आदेश जारी कर 197 प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने का निर्देश दिया था।

शेष 427 रिक्तियों को लेकर पुष्पलता सहित 50 अभ्यर्थियों ने कैट में याचिकाएं दायर कीं। अधिकरण ने 6 मार्च 2024 को रेलवे को रिक्तियों की स्थिति की जांच करने और पात्र अभ्यर्थियों को प्रतिस्थापन सूची के आधार पर नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश दिया था।

रेलवे ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 5 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने कैट के आदेश को बरकरार रखा। इसके बावजूद आदेश का क्रियान्वयन नहीं होने पर अभ्यर्थियों ने अलग-अलग निष्पादन आवेदन और अवमानना याचिकाएं दायर कीं।

अवमानना और निष्पादन कार्यवाही को अलग-अलग माना

पुष्पलता ने कैट में निष्पादन आवेदन दायर कर मूल आदेश का पालन कराने की मांग की थी। हालांकि, अधिकरण ने 25 सितंबर 2026 को यह कहते हुए आवेदन का निराकरण कर दिया कि मामला हाईकोर्ट में अवमानना कार्यवाही के तहत विचाराधीन है। इसी आदेश को पुष्पलता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता बीपी राव और पूजा सिन्हा ने दलील दी कि अवमानना कार्यवाही का उद्देश्य आदेश की अवहेलना के लिए जिम्मेदारी तय करना और कार्रवाई करना है, जबकि निष्पादन आवेदन का उद्देश्य अधिकरण के मूल आदेश को लागू कराना है।

दोनों कार्यवाहियों की प्रकृति और उनके परिणाम अलग-अलग हैं। इसलिए अवमानना प्रकरण लंबित होने के आधार पर निष्पादन आवेदन का निराकरण नहीं किया जा सकता।

रेलवे की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा ने भी कैट का आदेश निरस्त कर मामले को कानून के अनुसार सुनवाई के लिए वापस भेजने पर आपत्ति नहीं की। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि अवमानना और निष्पादन की कार्यवाही अलग-अलग उद्देश्य से संचालित होती हैं।

डिवीजन बेंच ने कैट का 25 सितंबर 2026 का आदेश निरस्त करते हुए पुष्पलता के निष्पादन आवेदन को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया है। कैट को निर्देश दिया गया है कि सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर देकर आवेदन का गुण-दोष के आधार पर निराकरण करे। रेलवे को भी अपना पक्ष रखने और आपत्तियां पेश करने का पूरा अवसर मिलेगा। हाईकोर्ट के इस फैसले से वर्ष 2010 की भर्ती की प्रतीक्षा सूची से जुड़े नियुक्ति विवाद में आगे की सुनवाई का रास्ता खुल गया है।