8th pay commission-8वें वेतन आयोग के नियमों से पेंशनभोगी नाराज, पीएम मोदी को पत्र लिख जताई बड़ी आशंकाएं
8वें वेतन आयोग के ToR को लेकर पेंशनभोगियों में चिंता है। CGPWA का कहना है कि मौजूदा और पारिवारिक पेंशनर्स को आयोग से बाहर रखा गया है। आइए जानते हैं...

8th pay commission/केंद्र सरकार द्वारा गठित होने वाले 8वें केंद्रीय वेतन आयोग को लेकर देश के लाखों पेंशनभोगियों के बीच बेचैनी और चिंता का माहौल बढ़ता जा रहा है। हाल ही में आयोग के ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ (ToR) के सार्वजनिक होने के बाद से यह विवाद खड़ा हुआ है कि क्या मौजूदा पेंशनभोगियों और पारिवारिक पेंशनभोगियों को इस नए वेतन आयोग के दायरे से बाहर रखा गया है।
8th pay commission/इस गंभीर मुद्दे पर सेंट्रल गवर्नमेंट पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन (CGPWA), जम्मू ने मोर्चा संभालते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को एक पत्र लिखा है। एसोसिएशन ने अपनी आपत्तियों में साफ तौर पर कहा है कि अधिसूचित नियम केवल वर्तमान में कार्यरत केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर केंद्रित नजर आते हैं, जिससे सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हितों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

एसोसिएशन के अध्यक्ष और पूर्व डीजीपी एस.पी. खोड़ा द्वारा भेजे गए इस पत्र में दावा किया गया है कि 3 नवंबर 2025 को जारी किए गए ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ में पेंशनभोगियों का स्पष्ट जिक्र न होना एक बड़ी भूल या जानबूझकर किया गया बदलाव हो सकता है। हालांकि, सरकार की ओर से समय-समय पर यह आश्वासन दिया जाता रहा है कि आयोग पेंशनभोगियों के हितों का भी पूरा ध्यान रखेगा, लेकिन लिखित दस्तावेजों में इसकी अनुपस्थिति ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।
8th pay commission/ पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि वित्त मंत्रालय ने राज्यसभा में यह स्पष्ट किया था कि पेंशन आयोग के दायरे में है, परंतु आधिकारिक अधिसूचना में इसकी झलक नहीं मिलने से पेंशनभोगी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

पेंशनभोगियों की एक बड़ी आपत्ति ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ में इस्तेमाल की गई शब्दावली को लेकर भी है। एसोसिएशन ने “गैर-अंशदायी पेंशन योजनाओं की अनफंडेड लागत” (Unfunded cost of non-contributory pension schemes) जैसे शब्दों के उपयोग पर कड़ी नाराजगी जताई है। एसोसिएशन का तर्क है कि पेंशन को एक वित्तीय बोझ के रूप में पेश करना संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने याद दिलाया कि सांसदों, न्यायाधीशों और रक्षा कर्मियों की पेंशन भी इसी श्रेणी में आती है, लेकिन उनके लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए पत्र में कहा गया है कि पेंशन कोई खैरात नहीं बल्कि कर्मचारियों का स्थगित वेतन और संपत्ति का अधिकार है, जिसे सेवानिवृत्ति की तारीख के आधार पर कम या भेदभावपूर्ण नहीं बनाया जा सकता।
पेंशनभोगियों ने वित्त विधेयक 2025 के माध्यम से सिविल सेवा पेंशन नियमों में किए गए संशोधनों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि ये बदलाव सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों को कमजोर करने की कोशिश हैं जो पेंशनभोगियों को एक समान वर्ग का मानते हैं। इसके अलावा, बुजुर्ग पेंशनभोगियों के लिए अतिरिक्त पेंशन की आयु सीमा कम करने और कम्यूटेड पेंशन की बहाली की अवधि 15 साल से घटाकर 12 साल करने की मांग भी फिर से जोर पकड़ने लगी है। एसोसिएशन का कहना है कि सरकार कम्यूटेड राशि 12 साल में ही वसूल कर लेती है, लेकिन बहाली के लिए 15 साल का इंतजार करना पेंशनभोगियों के साथ अन्याय है।

हालांकि, इन उठते हुए सवालों के बीच केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट करने की कोशिश की है। सरकार का आधिकारिक बयान है कि पेंशनभोगियों को 8वें वेतन आयोग के दायरे से बाहर नहीं किया गया है। वित्त मंत्रालय ने हाल ही में संसद में दिए गए एक जवाब में स्पष्ट किया था कि आयोग पेंशन और ग्रेच्युटी से संबंधित सभी पहलुओं पर गहन विचार करेगा। इसमें एनपीएस (NPS) और पुरानी पेंशन योजना से जुड़े सभी कर्मचारी शामिल होंगे।8th pay commission




