नई दिल्ली…यूरोप के उत्तरी छोर पर बसे नॉर्डिक देशों के साथ भारत के रिश्तों को नई दिशा देने की कवायद अब ठोस परिणामों में बदलती नजर आ रही है। ओस्लो में आयोजित तीसरे नॉर्डिक समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस आत्मविश्वास के साथ भारत की भूमिका रखी, उसने साफ संकेत दिया कि यह साझेदारी अब औपचारिक दायरे से निकलकर रणनीतिक गहराई हासिल कर रही है।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र, कानून के शासन और बहुपक्षवाद जैसे साझा मूल्यों को इस रिश्ते की बुनियाद बताया। उन्होंने कहा कि यही समानताएं भारत और नॉर्डिक देशों को स्वाभाविक साझेदार बनाती हैं। साथ ही, उन्होंने इस मंच की शुरुआत को आठ वर्ष पहले उठाया गया एक दूरदर्शी कदम बताते हुए कहा कि अब उसके परिणाम जमीन पर दिखने लगे हैं।

आर्थिक मोर्चे पर भी तस्वीर बदली हुई है। पिछले एक दशक में भारत और नॉर्डिक देशों के बीच व्यापार में कई गुना वृद्धि और निवेश में उल्लेखनीय उछाल इस सहयोग की मजबूती को दर्शाता है। हाल में लागू हुए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते तथा यूरोपीय संघ के साथ जारी मुक्त व्यापार वार्ताओं में नॉर्डिक देशों की भूमिका को भी प्रधानमंत्री ने भविष्य के लिए अहम बताया।

तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग को लेकर भी भारत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं। प्रधानमंत्री ने ग्रीन टेक्नोलॉजी, रिसर्च और स्टार्टअप इकोसिस्टम को जोड़ने की बात करते हुए कहा कि आने वाले समय में यह साझेदारी टिकाऊ विकास की दिशा तय कर सकती है।

वैश्विक मुद्दों पर भारत की स्थिति भी इस मंच से स्पष्ट हुई। प्रधानमंत्री ने संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शांति प्रयासों के समर्थन की बात दोहराते हुए यह भी रेखांकित किया कि आतंकवाद के खिलाफ किसी भी तरह का दोहरा रवैया स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्पष्ट और सख्त नीति का संकेत माना जा रहा है।