(रुद्र अवस्थी)   “चाहे कुछ भी हो जाए, थाना मत जाना…” नाटक के अंत में हाथ जोड़े, रुंधे गले से फगुआ जब यह बात कहता है, तो पं. देवकीनंदन दीक्षित सभागृह में पसरा सन्नाटा बहुत कुछ कह जाता है। यह संवाद किसी पात्र की सलाह भर नहीं है। यह उस आम आदमी का अनुभव है जो न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुँचा था और अपना बचा-खुचा भरोसा भी वहीं गँवा आया। फगुआ का अभिनय इतना दमदार था कि यह डॉयलाग बोलते हुए उसकी आँखों से सचमुच आंसू बहने लगे। इप्टा बिलासपुर की प्रस्तुति ‘साइकिल का पहिया’ इसी एक वाक्य के भीतर अपनी पूरी वेदना और व्यंग्य समेटे हुए है।

कहानी बेहद साधारण-सी बात से शुरू होती है। गरीब फगुआ की साइकिल गुम हो जाती है। उसके लिए साइकिल सवारी भर नहीं, उसकी स्ति शेष पत्नी की आखिरी निशानी भी है। वह भरोसे के साथ थाने पहुँचता है, पर वहाँ से कहानी का असली खेल शुरू होता है। रिपोर्ट लिखने और साइकिल खोजने की जगह पुलिस की दिलचस्पी मामले को अपने ढंग से निपटाने में है। पड़ोसी को पकड़कर थाने लाया जाता है और उसे चोर साबित करने की कोशिश होती है। आरोप से बचने के लिए उससे भी वसूली की जाती है।

इसके बाद पुलिस एक नई कहानी गढ़ती है कि चोर ने साइकिल कबाड़ी को बेच दी और कबाड़ी ने सब कुछ बेच दिया, बस पहिया बचा है। मामला “सुलझाने” के नाम पर फगुआ को साइकिल की जगह एक पहिया थमा दिया जाता है। यही नाटक का केंद्रीय बिंब है और शीर्षक की सार्थकता भी। पूरी साइकिल के हक़दार नागरिक को यह सिस्टम आख़िर में एक पहिया लेकर लौटने पर मजबूर करता है, और वह भी बहुत कुछ चुकाकर।

कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब फगुआ का बेटा थाने पहुँचकर सच बता देता है कि साइकिल चोरी हुई ही नहीं थी। उसका दोस्त बिना बताए ले गया था और सुरक्षित वापस छोड़ गया। अब तक के सारे आरोप, गिरफ्तारी और कहानियाँ झूठ साबित हो जाती हैं। पर व्यवस्था अपनी गलती मानने के बजाय इस सच को भी कमाई का ज़रिया बना लेती है। दरोगा बेटे को ही हिरासत में ले लेता है और फगुआ से कहा जाता है कि बच्चे को छुड़ाना है तो पैसे देने होंगे। जो परिवार शिकायतकर्ता था, वही अपराधी बना दिया जाता है। यही नाटक का सबसे तीखा प्रहार है।

इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह भ्रष्टाचार को भाषण या नारे की तरह नहीं रखती, घटनाओं के ज़रिये दिखाती है। लेखक गेहेंद्र जायसवाल ने दिखाया है कि भ्रष्टाचार हमेशा नोटों की गड्डी के रूप में नहीं आता। वह कई बार लापरवाही, टालमटोल, झूठे आरोप, गढ़ी हुई कहानियों और डर की शक्ल में आता है।

पहली परत है संवेदनहीनता। गुम साइकिल पुलिस के लिए छोटा मामला है, पर फगुआ के लिए वह जीवन का सवाल है। दूसरी परत है निर्दोष को फँसाने की प्रवृत्ति। असली जाँच की जगह पड़ोसी को आरोपी बनाकर आँकड़ा पूरा करने की जल्दबाज़ी दिखती है। तीसरी परत है झूठ का तंत्र। चोर, कबाड़ी और बिकी हुई साइकिल की पूरी कथा काल्पनिक है, जिसका मक़सद सिर्फ़ फ़ाइल बंद करना है। चौथी परत है अपराध का मुनाफ़े में बदल जाना। जब सच सामने आता है, तब भी न्याय नहीं होता, वसूली का नया बहाना मिल जाता है।

नाटक का अंतिम दृश्य इन सबको एक बिंदु पर लाता है। दृश्य में कबाड़ी पहिया देता दिखता है और पुलिसवाले बदले में पैसे की माँग करते हैं। मंच पर टूटी-सी साइकिल का पहिया एक प्रतीक बनकर उभरता है। यह उस न्याय-व्यवस्था का प्रतीक है जो अधूरी मिलती है और जिसके लिए भी कीमत चुकानी पड़ती है।

 

सचिन शर्मा के निर्देशन की सबसे अच्छी बात उसका संयम है। उन्होंने नाटक को मेलोड्रामा बनने से बचाया। थाने का माहौल, दरोगा और सिपाहियों की भाव-भंगिमा, कबाड़ी की चालाकी और पीड़ित की बेबसी सब कम साधनों में भी विश्वसनीय लगते हैं। मंच-सज्जा सादी है। एक मेज़, कुछ कुर्सियाँ और पीछे की पृष्ठभूमि थाने का परिवेश रचने के लिए काफ़ी हैं। साइकिल का पहिया ही सबसे प्रभावी मंच-सामग्री बन जाता है।

कलाकारों का सामूहिक अभिनय सराहनीय है। फगुआ की मासूमियत, डर और अंत की टूटन दर्शकों को भीतर तक छूती है। दरोगा का आत्मविश्वास भरा रौब और सिपाहियों की यांत्रिक आज्ञाकारिता व्यवस्था के चेहरे को साफ़ दिखाते हैं। कबाड़ी का पात्र हास्य और कुटिलता का अच्छा मेल है। ग्रामीणों और गाँव के पात्रों ने परिवेश को सहज बनाया है। फगुआ के बेटे का दृश्य, जब वह सच बताता है, नाटक का भावनात्मक शिखर है, क्योंकि वहीं से सच की जीत और न्याय की हार एक साथ दिखाई देती है। हवलदार का अभिनय भी सशक्त है। जो फगुआ से बात करते समय चुटीले अंदाज में सिस्टम के भ्रष्टाचार और बेरहमी पर लगातार चोट करता है।

संगीत ने भी दृश्यों के मिज़ाज को सँभाला। हल्के व्यंग्य के क्षणों में वह माहौल को हँसने लायक बनाता है और करुण क्षणों में पृष्ठभूमि में चुपचाप साथ रहता है। बीच – बीच  में यह छत्तीसगढ़ी गीत भी दर्शकों को दृश्य से जोड़ता है – गरीब के सुनइया कोनो नइए गा…।

नाटक की भाषा ठेठ, लोक-स्पर्श वाली और सरल है। “थाना मत जाना” जैसा संवाद इसी लोक-बोली की ताक़त है, जिसमें दर्शक अपने आसपास की आवाज़ पहचान लेते हैं। व्यंग्य की धार कहीं भी चुभने से नहीं चूकती, पर नाटक कटुता में भी नहीं डूबता। कई जगह दर्शक हँसते हैं, और वह हँसी बाद में सोचने पर मजबूर करती है कि हम किस बात पर हँस रहे थे। पूरा नाटक दर्शक को बांधे रखता है ।

कुछ जगहों पर पुलिस पात्रों का चित्रण थोड़ा एकरंगी लगता है, मानो पूरा तंत्र ही बिना किसी अपवाद के भ्रष्ट हो। कोई एक ईमानदार चेहरा कथानक में ज़्यादा द्वंद्व और गहराई ला सकता था। मध्य भाग में थाने के दृश्यों की पुनरावृत्ति से गति थोड़ी धीमी पड़ती है। फिर भी ये बातें प्रस्तुति के असर को कम नहीं करतीं।

‘साइकिल का पहिया’ हमें असहज करने वाला नाटक है और ठीक इसीलिए ज़रूरी भी है। यह याद दिलाता है कि जब सुरक्षा और न्याय देने वाली संस्थाएँ ही आम नागरिक से सौदा करने लगें, तो सबसे ज़्यादा नुकसान उसी का होता है जिसके पास खोने को सबसे कम है। फगुआ की साइकिल एक पहिये में सिमट जाती है, और उसका भरोसा उस पहिये से भी ज़्यादा टूटा हुआ लौटता है।

इप्टा की यह प्रस्तुति रंगमंच की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है जो मनोरंजन के साथ समाज से सवाल करना भी अपना धर्म मानती है। दर्शकों की सराहना इस बात का प्रमाण है कि ऐसे विषय आज भी लोगों के भीतर कहीं गहरे जुड़ते हैं। नाटक ख़त्म होने के बाद भी फगुआ का वह वाक्य कानों में गूँजता रहता है जिसे दर्शक अपने साथ लेकर लौटता है और वही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। नाटक के दौरान दर्शकों से भरे पं. देवकीनंदन दीक्षित सभा गृह को देखकर यह भी साबित होता है कि आज के दौर में भी बिलासपुर के नाट्य् प्रेमी मंचन को पसंद भी करते है और सम्मान भी करते है।

नाटक “साइकिल का पहिया” के लेखक  ग्रेट इंडियन मर्डर जैसे वेब सीरीज और छत्तीसगढ़ी फिल्मों के रचनाकार गेहेंद्र जायसवाल हैं। इसका सफल निर्देशन सचिन शर्मा ने किया है और संगीत मोबीन अहमद ,  सरजू राम साहू ने दिया। मुख्य पात्र के रूप में फगुआ की भूमिका  में जितेंद्र पांडे ने अपनी छाप छोड़ी। हवलदार राम सिंह की भूमिका मोबीन अहमद निभा रहे थे। दरोगा दल गंजन सिंह  का किरदार सचिन शर्मा ने निभाया। दिनेश पांडे ने कासिम कबाड़ी की भूमिका निभाई। गोवर्धन की भूमिका में जय बघेल, गोविंदा के किरदार में लतीश भांगे, सिपाही की भूमिका में शशांक देवांगन और ग्रामीण की भूमिका में आशुतोष त्रिवेदी ने अपनी छाप छोड़ी। नाटक के प्रारंभ में इप्टा बिलासपुर के अध्यक्ष अरुण दाभडकर ने आशिष सिंह, अनिल टाह, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ,हरिद्वार सिंह और नाटक के लेखक गेहेन्द्र जायसवाल का मंच पर स्वागत किया।