Mata Laxmi Ki Katha/दिवाली का पर्व हिंदू धर्म में सुख-समृद्धि, धन-वैभव और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली पर विधि-विधान से पूजा करने और व्रत कथा का पाठ या श्रवण करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

Mata Laxmi Ki Katha/मान्यता है कि दिवाली की कथा सुनने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और परिवार में धन-धान्य का आगमन होता है। इस वर्ष दिवाली का पर्व 8 नवंबर को मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं दीपावली से जुड़ी दो प्रचलित पौराणिक कथाओं के बारे में।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम के साथ उनकी पत्नी माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी रहते थे। जब श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी चल रही थी, तब उनकी सौतेली माता कैकेयी ने राजा दशरथ से मिले दो वरदानों के तहत श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी मांग ली।

पिता के वचन का मान रखने के लिए श्रीराम ने सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया। उनके साथ माता सीता और भाई लक्ष्मण भी वन चले गए। इस दौरान तीनों ने कई कठिनाइयों का सामना किया। 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों ने उनके स्वागत और खुशी में पूरे अयोध्या नगर को दीपों से रोशन कर दिया।

मान्यता है कि कार्तिक मास की अमावस्या की रात अयोध्या में दीप जलाने की इसी परंपरा से दीपावली पर्व की शुरुआत हुई। तभी से हर वर्ष कार्तिक अमावस्या को दीप जलाकर भगवान श्रीराम की वापसी की खुशी मनाई जाती है।

Mata Laxmi Ki Katha/एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को माता महालक्ष्मी समुद्र से प्रकट हुई थीं। इसलिए इस दिन मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है और घरों में दीप जलाकर उनका स्वागत किया जाता है।

दिवाली की दूसरी कथा: साहूकार की बेटी और मां लक्ष्मी की मित्रता/Mata Laxmi Ki Katha

एक गांव में एक साहूकार रहता था। उसकी बेटी प्रतिदिन एक पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने जाती थी। मान्यता के अनुसार, उस पेड़ पर मां लक्ष्मी का वास था। एक दिन मां लक्ष्मी ने साहूकार की बेटी से कहा कि वह उसकी मित्र बनना चाहती हैं। लड़की ने उनसे कहा कि वह अपने पिता से पूछकर जवाब देगी। घर लौटकर उसने पूरी बात अपने पिता को बताई। पिता की सहमति मिलने के बाद उसने मां लक्ष्मी की मित्रता स्वीकार कर ली।

इसके बाद दोनों सहेलियों की तरह मिलने-जुलने और बातचीत करने लगीं। एक दिन मां लक्ष्मी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गईं। वहां उन्होंने उसका खूब आदर-सत्कार किया और तरह-तरह के पकवान परोसे। विदा होते समय मां लक्ष्मी ने उससे पूछा कि वह उन्हें अपने घर कब बुलाएगी। साहूकार की बेटी ने उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण तो दे दिया, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति देखकर वह मन ही मन चिंतित हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मां लक्ष्मी का स्वागत कैसे कर पाएगी।

बेटी को उदास देखकर साहूकार ने उसकी चिंता का कारण पूछा। पूरी बात जानने के बाद उसने बेटी को समझाया कि वह घर की अच्छी तरह साफ-सफाई करे, मिट्टी से चौका लगाए और चार मुख वाला दीपक जलाकर मां लक्ष्मी का स्मरण करे। साहूकार की बेटी ने पिता की बात मानकर वैसा ही किया।

इसी दौरान एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर वहां आ पहुंची। वह हार साहूकार की बेटी के पास गिर गया। उसने हार को बेचकर मां लक्ष्मी के स्वागत और भोजन की व्यवस्था की। कुछ समय बाद मां लक्ष्मी भगवान गणेश के साथ उसके घर पहुंचीं। साहूकार की बेटी ने दोनों का पूरे आदर और श्रद्धा के साथ स्वागत-सत्कार किया। उसकी सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उस पर कृपा की। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसके बाद साहूकार का घर धन-धान्य और समृद्धि से भर गया।

इन कथाओं के माध्यम से दीपावली पर भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी, मां लक्ष्मी के प्राकट्य और श्रद्धा-भक्ति के महत्व को याद किया जाता है। यही वजह है कि इस दिन घरों में दीप जलाए जाते हैं और मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।Mata Laxmi Ki Katha