बिलासपुर। सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) में प्रशिक्षण अधिकारियों की भर्ती से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अभ्यर्थियों को राहत नहीं दी है। जस्टिस एनके चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने पंकज कैवर्त, इंदु वर्मा और दीपेश सिंह की याचिकाएं अलग-अलग तथ्यों और भर्ती की निर्धारित शर्तों के आधार पर खारिज कर दीं।

तीनों मामलों में याचिकाकर्ताओं ने अपनी उम्मीदवारी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। किसी ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियम बदलने का आरोप लगाया, तो किसी ने अनुभव की अवधि और प्रशिक्षण प्रमाणपत्र से जुड़े अंकों को लेकर अपनी दावेदारी पेश की। हाई कोर्ट ने संबंधित दस्तावेजों और भर्ती शर्तों के आधार पर राज्य शासन की कार्रवाई को उचित माना।

पंकज कैवर्त का मामला: भर्ती के बाद नियम बदलने का दावा साबित नहीं हुआ

महासमुंद जिले के पिथौरा निवासी पंकज कैवर्त ने प्रशिक्षण अधिकारी (मैकेनिक डीजल) पद पर अपनी उम्मीदवारी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि लिखित परीक्षा और मेरिट में आने के बाद दस्तावेज सत्यापन के दौरान ऐसे निर्देश लागू किए गए, जिनके तहत निर्धारित संस्थानों के अलावा अन्य संस्थाओं के अनुभव प्रमाणपत्रों को मान्य नहीं माना गया।

पंकज ने ग्राम तरंग एम्प्लॉयबिलिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड का अनुभव प्रमाणपत्र पेश किया था। राज्य शासन ने जवाब में कहा कि भर्ती विज्ञापन में ही आवश्यक शर्तों और निर्देशों की जानकारी दी गई थी। साथ ही, याचिकाकर्ता का अनुभव प्रमाणपत्र ऑटोमोबाइल ट्रेड से संबंधित था, जबकि भर्ती मैकेनिक डीजल पद के लिए थी।

हाई कोर्ट ने पाया कि याचिका में संबंधित भर्ती विज्ञापन की प्रति तक प्रस्तुत नहीं की गई थी। ऐसे में भर्ती शुरू होने के बाद पात्रता संबंधी शर्तों में बदलाव किए जाने का दावा साबित नहीं हो सका। कोर्ट ने यह भी माना कि प्रस्तुत निजी संस्था का अनुभव प्रमाणपत्र निर्धारित संस्थानों की श्रेणी में नहीं आता था। इसके आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।

इंदु वर्मा का मामला: 22 महीने की अवधि, लेकिन अनुभव के लिए 906 घंटे ही मान्य

बालौदाबाजार जिले के तेलकी गांव निवासी इंदु वर्मा ने प्रशिक्षण अधिकारी (इलेक्ट्रीशियन) पद के लिए आवेदन किया था। लिखित परीक्षा पास करने के बाद वह मेरिट में आईं, लेकिन दस्तावेज सत्यापन के दौरान आवश्यक अनुभव पूरा नहीं होने के आधार पर उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी गई।

इंदु ने बताया था कि उन्होंने शासकीय पॉलीटेक्निक कॉलेज भाटापारा में 17 मार्च 2021 से 25 मई 2023 तक पार्ट टाइम व्याख्याता के रूप में विद्युत विषय पढ़ाया था। उनके प्रमाणपत्र में करीब 22 महीने की अवधि दर्ज थी। उनका तर्क था कि 1,200 घंटे से अधिक प्रशिक्षण कार्य को एक वर्ष का अनुभव मानने संबंधी विभागीय निर्देश अतिथि व्याख्याताओं के लिए है, पार्ट टाइम व्याख्याताओं के लिए नहीं।

राज्य शासन ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत प्रमाणपत्र में वास्तविक अध्यापन कार्य केवल 906 घंटे दर्ज है। हाई कोर्ट ने भर्ती की शर्तों का परीक्षण करते हुए पाया कि डिग्रीधारियों के लिए एक वर्ष का अनुभव आवश्यक था और 1,200 घंटे से कम कार्य को एक वर्ष के अनुभव के रूप में नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने अतिथि और पार्ट टाइम व्याख्याताओं के कार्य की प्रकृति को इस मामले में समान मानते हुए 906 घंटे के अनुभव को पर्याप्त नहीं माना और इंदु वर्मा की याचिका भी खारिज कर दी।

दीपेश सिंह का मामला: 10 अंक हटाने के बाद भी मेरिट का दावा नहीं माना

रायपुर निवासी दीपेश सिंह ने प्रशिक्षण अधिकारी (सिलाई तकनीक) पद के लिए आवेदन किया था। लिखित परीक्षा में उन्हें 74 अंक मिले थे और वह मेरिट सूची में शामिल थे। दस्तावेज सत्यापन के दौरान उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी गई। उनके पास शिल्प प्रशिक्षक प्रशिक्षण प्रमाणपत्र नहीं था, लेकिन आवेदन में उन्होंने गलती से प्रमाणपत्र होने के विकल्प में ‘हां’ दर्ज कर दिया था।

दीपेश का कहना था कि यदि प्रमाणपत्र के आधार पर दिए गए अतिरिक्त 10 अंक हटा भी दिए जाएं, तब भी उनके 64 अंक रहेंगे और वह मेरिट में बने रहेंगे। उन्होंने 12 जुलाई 2012 से 3 जून 2020 तक सिलाई विषय पढ़ाने का अनुभव भी प्रस्तुत किया था।

राज्य शासन ने इसका विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को अतिरिक्त 10 अंक दिया जाना ही सही नहीं था। साथ ही, उनके द्वारा प्रस्तुत अनुभव प्रमाणपत्र निर्धारित सरकारी या मान्य प्रशिक्षण संस्थान से जारी नहीं हुआ था।

राज्य शासन के जवाब और भर्ती शर्तों से संबंधित तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने दीपेश सिंह की दावेदारी को स्वीकार नहीं किया और उनकी याचिका भी खारिज कर दी।

इस तरह प्रशिक्षण अधिकारी भर्ती से जुड़े तीनों मामलों में हाई कोर्ट ने अलग-अलग तथ्यों और पात्रता शर्तों की समीक्षा के बाद याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया।