बिलासपुर /हाईकोर्ट ने एक दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग की 20 सप्ताह की अनचाही गर्भावस्था को समाप्त करने (गर्भपात) की याचिका पर अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए रायपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को तत्काल प्रभाव से एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है, इसलिए विशेषज्ञों की राय के आधार पर ही इस मामले में अगला कदम उठाया जाएगा।

यह मामला रायपुर जिले के अभनपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां एक नाबालिग के साथ हुए जघन्य अपराध के बाद वह गर्भवती हो गई। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि पीड़िता वर्तमान में करीब 20 सप्ताह के अनचाहे गर्भ से गुजर रही है और वह इसे समाप्त करना चाहती है।

चूंकि गर्भावस्था 20 सप्ताह तक पहुंच चुकी है, इसलिए इसमें कानूनी और चिकित्सीय जटिलताएं शामिल हैं, जिसके चलते पीड़िता ने अदालत की शरण ली है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में CMHO रायपुर को निर्देशित किया है कि वे सबसे पहले पीड़िता के अभिभावकों की सहमति लें और उसके बाद एक उच्च स्तरीय मेडिकल बोर्ड का गठन करें। इस बोर्ड में महिला स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologist), बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician), रेडियोलॉजिस्ट और सोनोलॉजिस्ट सहित आवश्यकतानुसार अन्य विशेषज्ञों को शामिल किया जाना अनिवार्य है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यह बोर्ड न केवल पीड़िता की शारीरिक जांच करेगा, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति का भी गहन मूल्यांकन करेगा।

अदालत ने मेडिकल बोर्ड के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण सवाल रखे हैं, जिनका जवाब रिपोर्ट में देना होगा।

बोर्ड को यह बताना होगा कि वर्तमान में गर्भावस्था कितने सप्ताह की है और भ्रूण की स्थिति क्या है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विशेषज्ञों को यह स्पष्ट करना होगा कि इस अवस्था में गर्भपात (Abortion) कराने से नाबालिग के स्वास्थ्य या जीवन को कितना जोखिम हो सकता है। इसके साथ ही, कोर्ट ने यह भी राय मांगी है कि यदि इस गर्भावस्था को पूरी अवधि तक जारी रखा जाता है, तो उसका नाबालिग की सेहत पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए समय-सीमा निर्धारित कर दी है। मेडिकल बोर्ड को अपनी विस्तृत रिपोर्ट 14 अगस्त 2026 तक सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश करनी होगी। इस रिपोर्ट के आधार पर ही तय होगा कि पीड़िता को गर्भपात की अनुमति दी जाएगी या नहीं।