​रायपुर।छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े और बहुप्रतीक्षित कटघोरा–डोंगरगढ़ रेल कॉरिडोर को लेकर राजनीतिक दलों के बीच जो नौटंकी और श्रेय की रेस चल रही है, उसने अब सारी हदें पार कर ली हैं। जनता पूछ रही है—आखिर कब तक फाइलें एसी कमरों में धूल फांकती रहेंगी और कब तक झूठे शिलान्यासों के नाम पर छत्तीसगढ़ के माथे पर नाकामी का ठप्पा लगता रहेगा?

 2018 का शिलान्यास महज़ एक ‘चुनावी जुमला’ था क्या?

​आज सत्ता पक्ष जिस केंद्रीय मंजूरी और नई वित्तीय व्यवस्था का ढिंढोरा पीट रहा है, उसका जवाब विपक्ष के इस तीखे सवाल से कांप जाना चाहिए—जब इस परियोजना की नींव साल 2018 में ही रख दी गई थी, तो पिछले कई सालों तक इस पर ताला क्यों लटका रहा?
क्या उस वक्त का शिलान्यास सिर्फ चुनावों में वोट बटोरने का एक घटिया राजनीतिक स्टंट था? जनता को मूर्ख समझकर हर बार पुरानी फाइलों पर नया रंग-रोगन चढ़ाकर पेश करना बंद होना चाहिए। इस लेट-लतीफी ने प्रोजेक्ट को सिर्फ फाइलों तक सीमित रखा, ज़मीन पर एक ईंट तक नहीं जुड़ी!

लागत बढ़ी, निजी कंपनियां भागीं—तो अब इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?
​इस परियोजना का जो हाल हुआ है, वह प्रशासनिक और राजनीतिक अदूरदर्शिता का सबसे नग्न सत्य है:
​लागत में ₹2,050 करोड़ की भारी छलांग: जो प्रोजेक्ट कभी ₹5,950 करोड़ में पूरा होना था, वह अब सुस्ती और देरी के चलते ₹8,000 करोड़ तक पहुँच चुका है। यह बढ़ा हुआ पैसा क्या राजनेताओं की जेब से आएगा या आम जनता के टैक्स के खून-पसीने की कमाई से?
​महाजेंको और आर्यन कोल का किनारा: जैसे ही कंपनियों को समझ आया कि इस प्रोजेक्ट में बंदरबांट और राजनीतिक अड़ंगेबाज़ी के सिवा कुछ नहीं है, उन्होंने अपने हाथ खींच लिए। निजी निवेशकों का भाग जाना यह साबित करता है कि शासन-प्रशासन के स्तर पर प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता और प्लानिंग पूरी तरह से फेल साबित हुई है।

 राज्य की तिजोरी पर अरबों का कर्ज़ और जनता पर अत्याचार
​निजी निवेशकों के भागने के बाद अब सारा का सारा वित्तीय कोड़ा छत्तीसगढ़ की जनता पर बरसाया जा रहा है।
​लगभग ₹1,000 करोड़ का सीधा इक्विटी बोझ राज्य सरकार उठाएगी।
​बाक़ी बचा हुआ ₹6,000 करोड़ का महा-ऋण (Debt) बाजार से उठाया जाएगा, जिसके ब्याज का चक्रव्यूह आने वाली पीढ़ियों को गुलाम बना देगा।
​जब राज्य पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबा है, तब इस तरह के भारी-भरकम लोन और अधूरी प्लानिंग वाले प्रोजेक्ट्स के नाम पर जनता को वित्तीय संकट में झोंकना सबसे बड़ा अपराध है।
​चेतावनी: अब जुमले नहीं, पटरियों पर ट्रेन चाहिए!
​छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा को लूटने के लिए सब एकजुट हो जाते हैं, लेकिन जब जनता को बुनियादी रेल सुविधा देने की बारी आती है, तो फाइलें गायब हो जाती हैं। अब जनता को भाषणों और प्रेस विज्ञप्तियों से संतोष नहीं होने वाला। अगर इस बार भी यह परियोजना महज़ कागज़ी घोड़ों की दौड़ बनकर रह गई, तो जनता सत्ता और विपक्ष—दोनों को इसकी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर देगी!