बिलासपुर/बोदरी…बोदरी स्थित लक्ष्मीचंद इंस्टीट्यूट हायर सेकेंडरी स्कूल (एलसीआईटी) को लेकर फिर शिकायत सामने आई है। इस बार शिकायत फीस और प्रवेश तक सीमित नहीं है। किताब-ड्रेस, अतिरिक्त शुल्क, आरटीई विद्यार्थियों से राशि लिए जाने और कक्षा 11वीं-12वीं के विद्यार्थियों की वास्तविक उपस्थिति से जुड़े सवाल भी इसमें शामिल हैं। लेकिन इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी नई शिकायत नहीं, बल्कि 30 अप्रैल 2026 को कलेक्टर के निर्देश पर हुई पिछली जांच है।

करीब चार महीने पहले जांच के बाद विभागीय स्तर पर क्या निष्कर्ष निकला, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। अब उसी स्कूल को लेकर फिर शिकायत पहुंच गई। यही घटनाक्रम शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। अगर अप्रैल की जांच में शिकायतों का निराकरण हो गया था तो अगस्त में फिर वही मुद्दे क्यों लौटे? और अगर जांच में अनियमितता सामने आई थी तो कार्रवाई कहां हुई?

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यही वह बिंदु है जहां मामला केवल स्कूल प्रबंधन की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शिक्षा विभाग और प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ जाती है।

पांच दिन में प्रवेश निरस्त, नहीं लौटाया रूपया

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ताजा शिकायत के अनुसार एक छात्रा का 1 जुलाई 2026 को कक्षा 11वीं में एलसीआईटी में प्रवेश कराया गया। पालक ने इसके लिए 19,090 जमा किए। शिकायतकर्ता के अनुसार पांच दिन बाद प्रवेश निरस्त कर छात्रा को दूसरे विद्यालय में प्रवेश दिलाना पड़ा।

इसके बाद स्कूल प्रबंधन ने कथित तौर पर जमा राशि में से सिर्फ 800 वापस किए, जबकि शेष राशि वापस नहीं की गई।

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मामला अब सिर्फ रकम का नहीं है। सवाल यह है कि 19,090 किन-किन मदों में लिए गए थे? प्रवेश निरस्त होने के बाद स्कूल ने कितनी राशि रोकने का आधार बनाया? शुल्क की मदवार जानकारी क्या थी और फीस वापसी के लिए कौन-सा नियम लागू किया गया?

मामला सीएम हेल्पलाइन तक पहुंचने के बाद शिक्षा विभाग ने स्कूल प्रबंधन से दस्तावेजों सहित बिंदुवार जवाब मांगा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभागीय प्रक्रिया केवल जवाब लेने तक रहती है या शिकायत में दर्ज तथ्यों का रिकॉर्ड से मिलान भी सामने आता है।

 जांच के बाद फिर वही सवाल क्यों?

नई शिकायत का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि एलसीआईटी को लेकर प्रशासन पहले ही जांच करा चुका है। 30 अप्रैल को कलेक्टर के निर्देश पर गठित टीम ने जांच की थी। लेकिन उस जांच की रिपोर्ट क्या कहती है, यह अब तक स्पष्ट नहीं है।

जांच रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जमा हुई या नहीं, स्कूल प्रबंधन का लिखित पक्ष लिया गया या नहीं, फीस और प्रवेश संबंधी दस्तावेजों की जांच हुई या नहीं और जांच के बाद स्कूल को कोई निर्देश दिए गए या नहीं—इन सवालों का स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया है।

अब अगस्त में फिर शिकायत आने के बाद पुरानी जांच अपने आप प्रासंगिक हो गई है। अगर पहली जांच ने समस्या का समाधान कर दिया था तो नई शिकायत में फिर उसी तरह के आरोप क्यों दिखाई दे रहे हैं? और अगर पहली जांच अधूरी रही थी तो उसकी जिम्मेदारी किसकी थी?

किताब-ड्रेस से अतिरिक्त शुल्क की शिकायत

नई शिकायत में स्कूल की किताब और ड्रेस व्यवस्था को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि स्कूल से ही ड्रेस लेने और निर्धारित पाठ्य सामग्री खरीदने के लिए दबाव बनाया जाता है।

इसके साथ अलग-अलग मदों में अतिरिक्त शुल्क लिए जाने की बात भी शिकायत में कही गई है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन शिकायत का दायरा इतना व्यापक है कि मामला एक विद्यार्थी की फीस वापसी तक सीमित नहीं रह जाता।

शुल्क संरचना, फीस रसीद और किताब-ड्रेस की व्यवस्था से यह स्पष्ट हो सकता है कि पालकों से किस मद में कितनी राशि ली जा रही है और खरीद की वास्तविक व्यवस्था क्या है।

RTE को लेकर शिकायत ने बढ़ाई गंभीरता

आरटीई के तहत प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों से किताब, गतिविधि और अन्य मदों में अतिरिक्त राशि लेने का आरोप भी शिकायत में है।

यह आरोप सही है या गलत, इसका फैसला जांच से होगा। लेकिन आरटीई विद्यार्थियों से संबंधित शुल्क रिकॉर्ड इस मामले की अहम कड़ी है। स्कूल के पास आरटीई विद्यार्थियों की सूची और उनसे संबंधित रिकॉर्ड होना चाहिए। इसी रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो सकता है कि किन विद्यार्थियों से किस मद में राशि ली गई।

यही वजह है कि मामले को केवल एक छात्रा की फीस वापसी तक सीमित करके देखना शिकायत में उठाए गए दूसरे बिंदुओं को नजरअंदाज करना होगा।

विद्यार्थियों की वास्तविक उपस्थिति पर सवाल

शिकायत में कक्षा 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों के भौतिक सत्यापन का मुद्दा भी उठाया गया है। विषयवार कितने विद्यार्थी स्कूल के रिकॉर्ड में दर्ज हैं और वास्तव में कितने विद्यार्थी नियमित रूप से अध्ययन कर रहे हैं, यह सवाल भी शिकायत का हिस्सा है।

शिकायत में आशंका जताई गई है कि कुछ विद्यार्थी स्थानीय स्तर पर प्रवेश लेकर कोटा या मुंबई जैसे शहरों में पढ़ाई कर रहे हो सकते हैं। इसकी पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। लेकिन इस आशंका का जवाब प्रवेश रजिस्टर, उपस्थिति रिकॉर्ड और अन्य शैक्षणिक अभिलेखों से निकाला जा सकता है।

इसी तरह कक्षा 11वीं में कितने विद्यार्थियों को अस्थायी प्रवेश मिला है और कितने विद्यार्थियों का प्रवेश ओपन स्कूल की पूरक परीक्षा के बाद नियमित होना है, इसका आंकड़ा भी विद्यालय की वास्तविक शैक्षणिक स्थिति को स्पष्ट कर सकता है।

स्कूल बड़ा, सवाल उससे भी बड़े

एलसीआईटी कोई सामान्य शिक्षण संस्थान नहीं है। यह प्रदेश के बड़े कॉर्पोरेट घराने से जुड़े शैक्षणिक समूह का हिस्सा है। ऐसे संस्थान से जुड़ी शिकायत जब बार-बार सामने आए और पहले से जांच हो चुकी हो, तब निगाह केवल स्कूल प्रबंधन पर नहीं टिकती। सवाल उस प्रशासनिक व्यवस्था पर भी उठता है, जिसके जिम्मे नियमों और विभागीय निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना है।

क्या किसी बड़े संस्थान का प्रभाव इतना है कि जांच के बाद भी फाइल आगे नहीं बढ़ती? क्या विभागीय निर्देश कागजों तक सीमित रह जाते हैं? या फिर अप्रैल की जांच में वास्तव में ऐसा कुछ नहीं मिला था, जिससे कार्रवाई की जरूरत पड़ती?

इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, रिकॉर्ड से मिलेगा। लेकिन जवाब सामने न आने तक सवाल खत्म भी नहीं होंगे।

पुरानी जांच से नई शिकायत तक जुड़ती कड़ी

30 अप्रैल की जांच और अगस्त की नई शिकायत को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने से तस्वीर अधूरी रहेगी। एक ओर कलेक्टर के निर्देश पर जांच होती है, दूसरी ओर कुछ ही महीनों बाद उसी संस्थान को लेकर फीस, प्रवेश, किताब-ड्रेस, आरटीई और विद्यार्थियों की वास्तविक स्थिति से जुड़े आरोप फिर सामने आते हैं।

यहीं से विभाग की पिछली कार्रवाई महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि अप्रैल की जांच में सब कुछ नियमों के अनुरूप पाया गया था तो उसका निष्कर्ष सामने आना था। यदि कोई कमी मिली थी तो उसके बाद की कार्रवाई का रिकॉर्ड भी होना चाहिए था। लेकिन जब इन दोनों में से किसी की स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आती, तो नई शिकायत अपने आप पुरानी जांच पर सवाल खड़ा कर देती है।

नोटिस से आगे क्या हुआ, असली सवाल

सीएम हेल्पलाइन तक पहुंची नई शिकायत पर शिक्षा विभाग ने स्कूल प्रबंधन से दस्तावेजों सहित जवाब मांगा है। यह विभागीय प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन इस मामले की खासियत यही है कि यह पहला नोटिस नहीं है और यह पहली शिकायत भी नहीं है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि स्कूल क्या जवाब देता है। सवाल यह भी है कि अप्रैल की जांच के बाद विभाग ने क्या निष्कर्ष निकाला था और उस निष्कर्ष का आगे क्या हुआ।

नोटिस आया, जवाब आया और फाइल बंद हुई—या जांच किसी नतीजे तक पहुंची? यही फर्क कार्रवाई और कागजी कार्रवाई के बीच है।

बच्चों के भविष्य से जुड़ा मामला,सवाल गंभीर

फीस और प्रवेश का विवाद किसी एक पालक की आर्थिक परेशानी तक सीमित दिखाई दे सकता है, लेकिन जब उसी शिकायत के साथ आरटीई विद्यार्थियों, किताब-ड्रेस और 11वीं-12वीं के विद्यार्थियों की वास्तविक उपस्थिति जैसे सवाल जुड़ जाएं, तो मामला व्यापक हो जाता है।

यहां किसी आरोप को पहले से सही मान लेना पत्रकारिता नहीं होगी, लेकिन किसी गंभीर शिकायत को केवल जवाब लेकर खत्म कर देना भी पर्याप्त नहीं माना जा सकता। आरोप सही हैं तो उनका परिणाम सामने आए, गलत हैं तो स्थिति स्पष्ट हो—दोनों ही स्थिति में पालकों को तथ्य जानने का अधिकार है।

और यही वह बिंदु है जहां स्कूल प्रबंधन के साथ शिक्षा विभाग और प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अब असली परीक्षा किसकी?

एलसीआईटी पर लगे आरोप जांच के विषय हैं और उनका अंतिम सच जांच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन 30 अप्रैल की जांच से लेकर अगस्त की नई शिकायत तक घटनाक्रम ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।

एक बड़े शिक्षण संस्थान के खिलाफ शिकायतें सामने आती हैं, प्रशासन जांच कराता है, विभागीय प्रक्रिया आगे बढ़ती है और फिर कुछ महीनों बाद नए आरोप सामने आ जाते हैं—तो आखिर उस पूरी प्रक्रिया का हासिल क्या रहा? जिसका जवाब अब केवल स्कूल प्रबंधन को नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग और प्रशासन को भी देना होगा।

क्योंकि मामला सिर्फ 19,090 जमा कराने और 800 लौटाने का नहीं है। मामला यह भी है कि क्या नियम सभी शिक्षण संस्थानों पर समान रूप से लागू होते हैं? क्या विभागीय आदेशों का पालन प्रभाव के हिसाब से बदलता है? और 30 अप्रैल की जांच की वह फाइल आखिर कहां पहुंची, जिसके बाद अब फिर शिकायतों का सिलसिला सामने है?

अब देखना यही है कि इस बार फाइल बंद होगी या मामला किसी स्पष्ट निष्कर्ष और जवाबदेही तक पहुंचेगा।