CG NEWS:सुरजपुर (मनीष जायसवाल)  । लोकतांत्रिक व्यवस्था का पहिया तभी सुचारू रूप से घूमता है जब उसके हर पुर्जे सही दिशा में काम करे..! राज्य की पूरी मशीनरी को चलाने वाले अधिकारी और कर्मचारी ही हैं, लेकिन जब यही पुर्जे जाम हो जाएं तो पूरा सिस्टम ठहर जाता है..। 22 अगस्त को यही हुआ, जब प्रदेश भर के 121 संगठनों के पदाधिकारी और लाखों कर्मचारी सामूहिक अवकाश लेकर छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन के बैनर तले चरणबद्ध कार्यक्रम के तहत एक दिवसीय कलम बंद–काम बंद आंदोलन पर उतर आए..।

कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन का कहना है कि सरकार बदल गई, साल बदल गया, लेकिन परिस्थितियां जस की तस बनी हुई है..! मोदी की गारंटी के वादे पुराने हो रहे हैं, जो आज भी अधूरे है..। यह आंदोलन अब महंगाई भत्ता और आवास भत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि 11 सूत्रीय मांगों का रूप ले चुका है..। संगठन का संख्या बल और दबाव समूह और बड़ा हो गया है। यही वजह है कि धरना स्थलों पर उठ रही आवाजे सीधे-सीधे सरकार की छवि को चुनौती दे रही है।

धरना स्थल पर सबसे अधिक चर्चा मोदी की गारंटी, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सुशासन और वित्त मंत्री ओपी चौधरी के पुराने बयानों की रही है..। कर्मचारियों का आरोप है कि भाजपा का संकल्प पत्र और प्रधानमंत्री की गारंटी राज्य के कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए केवल कागज पर ही रह गई है..। बीते 20 महीनों से उनकी मांगों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है..!

कर्मचारियों का आक्रोश इस बात पर भी है कि किसानों के लिए धान खरीदी और महिलाओं के लिए महतारी वंदन योजना तो लागू कर दी गई, लेकिन उन्हीं योजनाओं को अमल में लाने वाले कर्मचारी उपेक्षित है..। उनका कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।

इस बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सरकार को पहले से अंदाजा था कि आंदोलन इतना बड़ा रूप ले सकता है तो संवाद का रास्ता पहले क्यों नहीं चुना गया..? संवाद ही वह औजार है, जो किसी भी टकराव को खत्म कर सकता है..।

अब तक सरकार की ओर से कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है। मुख्यमंत्री विदेश प्रवास पर हैं और सत्ता पक्ष में कोई वरिष्ठ मंत्री आगे नहीं आया, जो फेडरेशन के प्रतिनिधियों से मिलकर ठोस आश्वासन दे सके..। सत्ता समर्थकों का तर्क है कि वित्तीय संसाधनों की सीमाएं है, लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि जब अन्य योजनाओं के लिए धन उपलब्ध हो सकता है तो उनके अधिकारों पर रोक क्यों लगाई जा रही है..?

असल में यह आंदोलन केवल एक दिन की हड़ताल भर नहीं है। यह उस विचार को जन्म देता है कि कर्मचारी और अधिकारी भी अपने वोट की ताकत से सत्ता की दिशा बदल सकते है..। यही वजह है कि यह विरोध सरकार के लिए महज काम रुकने का संकेत नहीं, बल्कि सत्ता को आईना दिखाने की प्रक्रिया है..।

व्यवस्था को थामे रखने वाले हाथ यदि रुक गए तो पूरा इंजन ठहर जाएगा..। और अगर ऐसा हुआ तो फिर गारंटी चाहे जितनी दी जाए, जनता का भरोसा वापस पाना आसान नहीं होगा..! इतिहास गवाह है कि कर्मचारियों की नाराजगी कई बार सरकारों की किस्मत बदल चुकी है।