धमतरी/छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा राज्यभर में किए गए ‘युक्तियुक्तकरण‘ के दावों की जमीनी हकीकत अब सड़कों पर नजर आने लगी है। विभाग के आला अधिकारियों ने प्रक्रिया पूरी होने के बाद दावा किया था कि अब स्कूलों में व्यवस्थाएं दुरुस्त कर ली गई हैं, लेकिन सोमवार को धमतरी और बालोद जिलों से सामने आई तस्वीरों ने इन दावों की पोल खोल दी है।

शिक्षकों की कमी और स्कूलों के विलय (मर्जर) से नाराज छात्र और ग्रामीण भारी बारिश के बीच सड़कों पर उतर आए, जिससे पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।

धमतरी जिले के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बारना में सोमवार को उस वक्त स्थिति तनावपूर्ण हो गई, जब शिक्षकों की कमी से आक्रोशित ग्रामीणों और छात्र-छात्राओं ने स्कूल के मुख्य गेट पर ताला जड़ दिया। बरसते पानी में छात्र सड़क पर बैठ गए और विभाग के खिलाफ नारेबाजी की। ग्रामीणों और स्कूल प्रबंधन समिति का आरोप है कि विद्यालय में हिंदी, अंग्रेजी, सामाजिक विज्ञान, रसायन और भूगोल जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षक ही नहीं हैं।

बच्चों का भविष्य अंधकार में है क्योंकि मुख्य विषयों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई है। ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि जब तक इन रिक्त पदों पर तत्काल नियुक्तियां नहीं की जातीं, उनका आंदोलन और तेज होगा।

दूसरी तरफ, बालोद जिले के शासकीय नवीन प्राथमिक शाला शिकारीटोला क्रमांक 2 में भी भारी अव्यवस्था देखने को मिली। यहां के ग्रामीणों ने भी स्कूल में ताला जड़कर विभाग के प्रति अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों की नाराजगी विभाग के उस फैसले को लेकर है, जिसमें युक्तियुक्तकरण के नाम पर शिकारीटोला के स्कूल को माध्यमिक विद्यालय करियाटोला में मर्ज कर दिया गया है।

ग्रामीणों का कहना है कि यह निर्णय लेते समय स्थानीय लोगों से कोई रायशुमारी नहीं की गई और अधिकारियों ने मनमाने ढंग से स्कूल बंद कर उसे दूसरे गांव में विलय कर दिया, जिससे छोटे बच्चों को दूर जाने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

ये दोनों घटनाएं शिक्षा विभाग की कागजी रिपोर्ट और धरातल की सच्चाई में बहुत बड़ा अंतर है। एक तरफ जहां सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी विषयों के शिक्षकों का न होना और बिना जन-सहमति के स्कूलों का विलय करना छात्रों के अधिकारों का हनन साबित हो रहा है। फिलहाल, इन प्रदर्शनों ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है, लेकिन अब देखना यह होगा कि क्या विभाग इन संवेदनशील मुद्दों पर कोई ठोस कार्रवाई करता है या छात्र इसी तरह बारिश में अपने हक के लिए संघर्ष करने को मजबूर रहेंगे।