बिलासपुर। अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र के दावे को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस एके प्रसाद की एकलपीठ ने कहा है कि मध्य प्रदेश के पुनर्गठन से पहले एक ही राज्य का हिस्सा रहे क्षेत्रों के बीच स्थान परिवर्तन को सामान्य रूप से दूसरे राज्य में पलायन मानकर जाति प्रमाणपत्र का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में राज्य पुनर्गठन की परिस्थितियों, पुराने दस्तावेजों और लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना जरूरी है।

हाई कोर्ट ने राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ निवासी पल्लवी मेश्राम की याचिका स्वीकार करते हुए उनके जाति प्रमाणपत्र के दावे को खारिज करने वाले एसडीएम और अपर कलेक्टर के आदेश निरस्त कर दिए हैं। कोर्ट ने सक्षम अधिकारी को मामले पर नए सिरे से विचार कर 60 दिनों के भीतर कारण सहित निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

डोंगरगढ़ निवासी पल्लवी मेश्राम ने महार अनुसूचित जाति का स्थायी सामाजिक प्रास्थिति प्रमाणपत्र जारी करने के लिए आवेदन किया था।

अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), डोंगरगढ़ ने 12 अगस्त 2022 को उनका आवेदन खारिज कर दिया। इस आदेश के खिलाफ पल्लवी ने अपर कलेक्टर के न्यायालय में अपील की, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। अपर कलेक्टर ने एसडीएम के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी थी।

अधिकारियों ने अपने आदेश में कहा था कि पल्लवी के पूर्वज मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के निवासी थे और परिवार के पास 10 अगस्त 1950 से पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में निवास का पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसके बाद पल्लवी ने दोनों आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता लव कुमार रामटेके ने दलील दी कि पल्लवी के पिता वर्ष 1987 से डोंगरगढ़ में रह रहे हैं और उनका जन्म भी इसी क्षेत्र में हुआ है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के पुनर्गठन से पहले बालाघाट और डोंगरगढ़ दोनों अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा थे। इसलिए पुराने निवास संबंधी दस्तावेजों का मूल्यांकन राज्य पुनर्गठन की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

अधिवक्ता ने अपनी दलीलों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के पंकज कुमार बनाम झारखंड राज्य और अखिलेश प्रसाद बनाम झारखंड लोक सेवा आयोग के फैसलों का भी हवाला दिया।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता 1950 से पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अपने पूर्वजों के निवास का विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकी थीं। अधिकारियों ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही निर्णय लिया था।

हाई कोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि बालाघाट और डोंगरगढ़ मध्य प्रदेश के पुनर्गठन से पहले एक ही राज्य का हिस्सा थे। ऐसे में दोनों क्षेत्रों के बीच स्थान परिवर्तन को सामान्य अंतरराज्यीय पलायन की तरह नहीं देखा जा सकता। केवल इस आधार पर कि परिवार के पास 1950 से पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में निवास का दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जाति प्रमाणपत्र का दावा खारिज करना पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने कहा कि अधिकारियों को राज्य पुनर्गठन की परिस्थितियों, पुराने अभिलेखों और वर्ष 2013 के संबंधित नियमों के तहत उपलब्ध दस्तावेजों का समग्र रूप से मूल्यांकन करना चाहिए था। इन पहलुओं पर उचित विचार किए बिना याचिकाकर्ता का दावा खारिज करना उचित नहीं है।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने एसडीएम और अपर कलेक्टर के दोनों आदेश निरस्त कर दिए।

साथ ही सक्षम अधिकारी को निर्देश दिया कि वह पल्लवी मेश्राम के जाति प्रमाणपत्र के दावे पर सभी संबंधित दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर नए सिरे से विचार करे और 60 दिनों के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करे।