बिलासपुर…लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक, राष्ट्रीय संरक्षक और समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने मौजूदा दौर के जन आंदोलनों की दिशा, दशा और उनके पीछे काम कर रहे वैचारिक प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने ‘जेन-जी’ जैसे विदेशी शब्दों के बढ़ते इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए कहा कि आज आंदोलनों के एजेंडे केवल जनता की स्वाभाविक बेचैनी से तय नहीं हो रहे, बल्कि विदेशी प्रभाव, कॉर्पोरेट हित और पूंजीवादी नैरेटिव भी उन्हें प्रभावित कर रहे हैं।

बिलासपुर प्रेस क्लब में ‘जन आंदोलन : दशा और दिशा’ विषय पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए ठाकुर ने कहा कि वास्तविक जन आंदोलन स्वतःस्फूर्त होते हैं, जनता के अपने संसाधनों से खड़े होते हैं और उनका लक्ष्य केवल किसी तात्कालिक मांग की पूर्ति नहीं, बल्कि व्यवस्था में व्यापक बदलाव होना चाहिए। उनके मुताबिक आज कई आंदोलन सीमित उद्देश्यों तक सिमट जाते हैं, इसलिए वे व्यवस्था पर स्थायी प्रभाव नहीं डाल पाते।

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नई पीढ़ी आंदोलन में आई, उम्मीद की बात है’

ठाकुर ने हालिया आंदोलनों की आलोचना के बीच यह भी स्वीकार किया कि इन आंदोलनों ने सरकार को झेंपने के लिए मजबूर किया है और नई पीढ़ी के युवाओं की सक्रिय भागीदारी सामने आई है। हालांकि उन्होंने आंदोलन के नाम पर गाली-गलौज, पथराव और तोड़फोड़ को लोकतांत्रिक संघर्ष के अनुकूल नहीं माना। दिल्ली के आंदोलन में प्रधानमंत्री के प्रति अभद्र भाषा और हिंसक तौर-तरीकों पर उन्होंने असहमति जताई।

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अन्ना आंदोलन से सत्ता बदली, व्यवस्था नहीं 

2010-11 के अन्ना आंदोलन का उल्लेख करते हुए ठाकुर ने उसे प्रायोजित आंदोलन बताया और कहा कि उसके परिणामस्वरूप सत्ता परिवर्तन तो हुआ, लेकिन व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। NEET पेपर लीक के संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि जब परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर संकट सामने आए, तब राजनीतिक नेतृत्व की सक्रियता उतनी दिखाई नहीं दी, जितनी बाद में आंदोलनों के दौरान नजर आई।

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 सवाल को फिर केंद्र में लाने की जरूरत

फ्रांसिस फुकुयामा की पुस्तक ‘द एंड ऑफ हिस्ट्री’ का संदर्भ देते हुए ठाकुर ने कहा कि दुनिया में समानता, समाजवाद और बराबरी के विचारों को कमजोर कर पूंजीवाद को अंतिम और एकमात्र व्यवस्था के रूप में स्थापित करने का वैचारिक प्रयास हुआ। उनका कहना था कि सामाजिक और आर्थिक विषमता के वास्तविक सवालों से ध्यान हटाकर समाज को मजहबी और सांस्कृतिक टकरावों में उलझाया जा रहा है।

कसौटियों पर खरा उतरना चाहिए जन आंदोलन

ठाकुर ने कहा कि किसी भी वास्तविक जन आंदोलन की बुनियाद पांच बातों पर होनी चाहिए—वह स्वतःस्फूर्त हो, जनता के अपने संसाधनों से संचालित हो, उसका लक्ष्य व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में हो, हिंसा और तोड़फोड़ से दूर रहे तथा उसकी अभिव्यक्ति तार्किक, संयमित और लोकतांत्रिक हो।

महाराष्ट्र के भाषा विवाद पर केंद्र को घेरा

महाराष्ट्र में गैर-मराठी और हिंदी भाषियों के साथ कथित दुर्व्यवहार को ठाकुर ने दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इसे भाषाई असहिष्णुता का गंभीर उदाहरण बताया। उन्होंने केंद्र सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत हिंदी को लेकर विरोध के मामलों में अलग-अलग राज्यों के प्रति अलग दृष्टिकोण दिखाई देता है। उन्होंने तमिलनाडु और महाराष्ट्र के संदर्भ में केंद्र की नीतिगत प्रतिक्रिया में कथित अंतर का मुद्दा उठाया और इसे ‘नया भाषाई साम्राज्यवाद’ करार दिया।

प्रेस वार्ता में वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार तिवारी, जावेद उस्मानी सहित ठाकुर के समर्थक उपस्थित रहे।