जनता की ‘आह’ से हिलेगा अफसरशाही का सिंहासन! सुशासन तिहार में विधायक का फूटा गुस्सा, कहा—घमंड छोड़ो, नहीं तो कुर्सी डोलेगी
बलरामपुर में ‘सुशासन’ की पोल: मंच से ही अफसरों को खरी-खरी सुनाई

बलरामपुर…(पृथ्वीलाल केशरी) जिला से एक बार फिर प्रशासनिक सुस्ती और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव का मामला सामने आया है। ‘सुशासन तिहार’ जैसे सरकारी कार्यक्रम के बीच ही व्यवस्था की हकीकत उजागर हो गई, जब प्रतापपुर की विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते ने मंच से अधिकारियों को तीखी फटकार लगाई।
8 मई को वाड्रफनगर ब्लॉक में आयोजित इस कार्यक्रम का मकसद सरकारी योजनाओं को गति देना था, लेकिन यहां पहुंचे ग्रामीणों ने प्रशासनिक लापरवाही की परतें खोलकर रख दीं। सीमांकन, नामांतरण, बंटवारा और पट्टा जैसे बुनियादी राजस्व कार्य महीनों से लंबित पड़े हैं। हालात यह हैं कि बुजुर्ग और गरीब ग्रामीण सुबह से बसों में सफर कर दफ्तर पहुंचते हैं, लेकिन दिन भर भटकने के बाद खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं।
पढ़ाई का घमंड छोड़ो, जनता से ऊपर मत समझो
ग्रामीणों की पीड़ा सुनते ही विधायक पोर्ते का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने दो टूक शब्दों में अधिकारियों को चेताया कि पढ़-लिखकर पद पाने का मतलब यह नहीं कि वे जनता से ऊपर हो गए हैं। उन्होंने कहा, “आपके पास कलम की ताकत है, लेकिन उसका इस्तेमाल जनता की सेवा के लिए होना चाहिए, न कि उन्हें दौड़ाने के लिए।”
विधायक ने साफ चेतावनी दी कि जो लोग निराश होकर दफ्तरों से लौटते हैं, उनकी ‘आह’ और ‘श्राप’ बड़े-बड़े पदों के घमंड को चकनाचूर कर सकते हैं। उन्होंने अधिकारियों को एसी कमरों से बाहर निकलकर गांवों में जाकर समस्याएं सुलझाने के निर्देश दिए।
योजनाएं कागज पर, जनता परेशान—जवाबदेह कौन
विधायक ने सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि आखिर इनका लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? उन्होंने स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधि विकास कार्यों के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन योजनाओं को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी प्रशासन की है—और वहीं सबसे बड़ी चूक हो रही है।
पहले भी गरमाया था माहौल
यह पहला मौका नहीं है जब जिले में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव सामने आया हो। इससे पहले सामरी विधायक उद्धेश्वरी पैकरा भी राजपुर में अधिकारियों की अनुपस्थिति पर भड़क चुकी हैं और एसडीएम को हटाने तक का अल्टीमेटम दे चुकी हैं। हालांकि, हालात में कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आया।
सुशासन के दावे बनाम जमीनी हकीकत
बलरामपुर में ‘सुशासन तिहार’ अब सवालों के घेरे में है। एक ओर सरकार योजनाओं का ढिंढोरा पीट रही है, तो दूसरी ओर जनता छोटे-छोटे कामों के लिए दर-दर भटक रही है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी ने व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है—और इसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है।





