स्कूल नहीं, ‘एडमिशन मंडी’: प्रॉक्सी हाजिरी का सिंडिकेट बेनकाब, बिलासपुर के नामी संस्थान कटघरे में
क्लासरूम खाली, रजिस्टर फुल: बिलासपुर में ‘प्रॉक्सी एजुकेशन’ का काला खेल उजागर

बिलासपुर: शिक्षा का मंदिर अब सौदेबाजी का केंद्र बनता दिख रहा है। बिलासपुर के कई नामी स्कूलों में ‘प्रॉक्सी एडमिशन’ का ऐसा संगठित खेल सामने आया है, जहां पढ़ाई कहीं और होती है और हाजिरी यहां लगती है। मामला सिर्फ नियम उल्लंघन का नहीं, बल्कि एक पूरे सिंडिकेट का संकेत है।

शहर के प्रतिष्ठित स्कूल—बिरला ओपन माइंड मोपका, नारायणा, लोयला, सेंट जेवियर्स और मोरल एंड मॉडर्न एजुकेशन—कक्षा 11वीं और 12वीं को कमाई के जरिये में बदलते नजर आ रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि मोटी रकम लेकर छात्रों की फर्जी उपस्थिति दर्ज की जाती है, ताकि वे बिना स्कूल आए परीक्षा देने के पात्र बने रहें।
नियम साफ हैं—सीबीएसई और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अनुसार सालाना परीक्षा के लिए कम से कम 75 प्रतिशत उपस्थिति जरूरी है। लेकिन यहां नियम कागजों तक सीमित हैं। विज्ञान और गणित के कई छात्र कोटा, दिल्ली और जयपुर में कोचिंग कर रहे हैं, जबकि उनके नाम पर बिलासपुर के स्कूलों में नियमित हाजिरी दर्ज हो रही है।
यह खेल यहीं खत्म नहीं होता। साल भर स्कूल नहीं आने वाले छात्रों की तस्वीरें रिजल्ट के बाद विज्ञापनों में छापी जाती हैं, मानो उनकी सफलता का श्रेय स्कूल को हो। यह सीधे तौर पर अभिभावकों को गुमराह करने और ईमानदारी से पढ़ने वाले छात्रों के साथ अन्याय है।
जिला प्रशासन की गाइडलाइन भी यहां बेअसर दिखती है। किताबों और यूनिफॉर्म में भी एकाधिकार मॉडल लागू है। अभिभावकों को महंगी किताबों का पूरा सेट तय दुकानों से खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि वही सामग्री बाजार या ऑनलाइन सस्ती उपलब्ध है। यूनिफॉर्म के लिए भी एक खास दुकान तय—यानी विकल्प खत्म, खर्च तय।
फीस के मोर्चे पर भी तस्वीर अलग नहीं है। छत्तीसगढ़ फीस विनियमन कानून के तहत तय प्रक्रिया और सीमा के बावजूद हर साल 10 से 15 प्रतिशत तक फीस बढ़ाई जा रही है। स्कूल लेवल कमेटी कागजों में मौजूद है, फैसले प्रबंधन के कमरे में होते हैं। ट्यूशन फीस के अलावा डेवलपमेंट चार्ज और एनुअल फीस के नाम पर अलग से वसूली—अभिभावक लगातार दबाव में।
जांच से बचने का तरीका भी उतना ही चौंकाने वाला है। जब भी निरीक्षण की आहट मिलती है, ‘प्रॉक्सी’ वाले छात्रों को उस दिन रजिस्टर में छुट्टी पर दिखा दिया जाता है। कागजों का यह जाल इतना मजबूत है कि बिना गहराई में जांच के सच तक पहुंचना आसान नहीं।
अभिभावकों में आक्रोश साफ दिख रहा है। उनका कहना है कि स्कूल अब सेवा का केंद्र नहीं, बल्कि मुनाफे का कारोबार बन चुके हैं। मध्यमवर्गीय परिवार फीस, किताब और यूनिफॉर्म के दबाव में पिस रहा है, जबकि सिस्टम खामोश है।
सवाल सीधा है—क्या जिला शिक्षा प्रशासन इन प्रभावशाली संस्थानों के सामने यूं ही झुकता रहेगा, या फिर नियमों को तोड़ने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी?क्योंकि इस बार मामला सिर्फ फीस या हाजिरी का नहीं—
यह भरोसे के टूटने का मामला है।





