बिलासपुर (मनीष जायसवाल)। छत्तीसगढ़ में शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET को लेकर सरकार के रुख और शिक्षकों से जुड़े दूसरे मुद्दों ने एक बार फिर आंदोलन की जमीन तैयार कर दी है..। तीन शिक्षक संगठनों ने एकजुट होकर 9 सितंबर को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के जशपुर जिले के बगिया स्थित विधानसभा मुख्यालय निवास और स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के दुर्ग स्थित गृह निवास तक शिक्षक सेवा सुरक्षा न्याय पदयात्रा निकालने का अल्टीमेटम दिया है..। दोनों स्थानों पर मांगें पूरी होने तक अनिश्चितकालीन धरने की घोषणा की गई है। TET के मुद्दे को लेकर प्रदेश के कई अन्य शिक्षक संगठन भी आंदोलन की राह पर हैं।

देखा जाए तो मामला इस समय सिर्फ TET का नहीं है। TET के साथ सेवा सुरक्षा, सहायक शिक्षकों की वेतन विसंगति, पुरानी सेवा की गणना, युक्ति युक्तकरण के बाद हुए तबादले और भर्ती से जुड़े पुराने मुद्दे भी एक-एक कर सामने आ रहे है..। यही वजह है कि स्कूल शिक्षा विभाग के सामने शिक्षकों की नाराजगी अब किसी एक संगठन या एक मांग तक सीमित दिखाई नहीं दे रही है।

स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने जब से पदभार संभाला है, उनके कार्यकाल में स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में कई ऐसे फैसले और पहल हुई है, जिनका असर आने वाले समय में दिखाई दे सकता है। कई कामों की सराहना भी हुई है। मंत्री का स्कूलों में जाना, छात्रों से सीधे बातचीत करना और शिक्षा व्यवस्था को जमीन पर समझने की कोशिश करना भी चर्चा में रहा है। लेकिन दूसरी तरफ विभाग के कर्मचारियों और शिक्षकों के बीच संवाद की कमी और कुछ फैसलों को लेकर नाराजगी भी है। इसलिए इसे खबरों के लिहाज से नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

प्रदेश में 12वीं सीजी बोर्ड की हिंदी परीक्षा के पेपर लीक का मामला हो या केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा वापस लेने की अपील का विषय, युवा वर्ग में शिक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा हुई है। विद्या मितान का मुद्दा और 2019 में बस्तर तथा सरगुजा संभाग के लिए सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा की प्रतीक्षा सूची को आगे नहीं बढ़ाए जाने से जुड़े मामले भी लंबे समय से चर्चा में हैं। डीएड किए हुए अभ्यर्थियों के बीच भर्ती को लेकर असंतोष है।

यहीं से शिक्षा विभाग की नाराजगी का दायरा बड़ा दिखाई देता है। एक तरफ Gen Z है, जिसकी अपनी चिंताएं हैं और दूसरी तरफ सहायक शिक्षकों और शिक्षकों का बड़ा वर्ग है, जिसमें Millennials और Gen X की पीढ़ी शामिल है। इनकी चिंता अलग-अलग है। किसी के सामने भर्ती का मुद्दा है तो किसी के सामने नौकरी बचाने का..। कोई वेतन विसंगति को लेकर परेशान है तो किसी के सामने पुरानी सेवा की गणना का विषय है। युक्ति युक्तकरण के बाद हुए तबादलों का मुद्दा भी शिक्षकों के बीच नाराजगी का कारण है।

सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन के संयोजक मनीष मिश्रा कहते हैं कि 1996 से लेकर अब तक की सरकारों ने शिक्षकों को आंदोलनकारी बनने के लिए मजबूर किया है। अपनी अस्थाई नौकरी को स्थाई भी शिक्षकों ने आंदोलन के दम पर कराया..। हक की लड़ाई में विपक्ष हमेशा साथ दिखाई दिया, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही विपक्ष शिक्षकों को भूल गया। उनका कहना है कि संविलियन जैसी बड़ी सौगात मिलने के बाद शिक्षक भी कई मुद्दों को पीछे छोड़ बैठे और सहायक शिक्षकों की वेतन विसंगति का विषय नजरअंदाज होता चला गया।

मनीष मिश्रा के मुताबिक वेतन विसंगति के मामले में मोदी की गारंटी लागू नहीं हुई। सरकार को ढाई साल से अधिक समय हो गया है और इसी बीच TET जैसा महत्वपूर्ण मुद्दा सामने खड़ा हो गया है, जो सीधे शिक्षकों की रोजी-रोटी और भविष्य से जुड़ा है। उनका कहना है कि सरकार इस मुद्दे पर भी शिक्षकों को निर्णय के इंतजार में रख रही है।

मनीष मिश्रा बताते हैं कि स्कूल शिक्षा मंत्री ने एक साक्षात्कार में कहा था कि TET के विषय में सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रख रही है और वहां से निर्णय आने के बाद स्थानीय स्तर पर परीक्षा को लेकर निर्णय लिया जाएगा। शिक्षक संगठनों का कहना है कि न्यायालय के आदेश के बाद तमिलनाडु सहित दूसरे राज्यों में कार्यरत शिक्षकों के लिए विभागीय TET को लेकर व्यवस्था की गई है। तमिलनाडु में सेवारत शिक्षकों के लिए परीक्षा आयोजित किए जाने का भी संगठन हवाला दे रहे हैं। उनका कहना है कि जब न्यायालय का आदेश पूरे देश पर लागू है तो छत्तीसगढ़ में सेवारत शिक्षकों के लिए परीक्षा आयोजित करने में देरी क्यों हो रही है।

मनीष मिश्रा ने बताया कि NCTE ने 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना के माध्यम से TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य किया था। ऐसे में यदि राज्य शासन की ओर से परीक्षा का आयोजन नहीं होगा तो शिक्षक परीक्षा में शामिल कैसे होंगे। उनकी चिंता यह है कि निर्धारित समय तक TET पात्रता हासिल नहीं करने वाले शिक्षकों की नौकरी पर संकट आ सकता है। प्रदेश में ऐसे कई शिक्षक हैं, जिनकी सेवा अभी 10 से 15 साल बची हुई है। ऐसे में उनके सामने सिर्फ परीक्षा पास करने की चुनौती नहीं है, उनके परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी इससे जुड़ी है।

शिक्षक नेता कहते हैं कि स्कूल में पढ़ाते हुए आम परीक्षार्थियों के साथ TET की तैयारी करना आसान नहीं है…। मनीष मिश्रा उदाहरण देते हैं कि कोई अफसर 10 साल नौकरी करने के बाद फिर से प्रतियोगी परीक्षा दे तो उसके लिए नए अभ्यर्थी की तरह तैयारी करना आसान नहीं होगा..। शिक्षक भी बच्चों को पढ़ाने, विभागीय काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उसी तरह तैयारी नहीं कर सकता…। इसके बावजूद शिक्षक TET से पीछे नहीं हट रहे हैं। उनकी मांग है कि उन्हें पर्याप्त अवसर और जरूरी राहत दी जाए, ताकि वे परीक्षा पास कर अपनी नौकरी सुरक्षित रख सकें…।

मनीष मिश्रा बताते हैं कि शिक्षक सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सम्मान करते हैं। अंतिम निर्णय न्यायालय का ही होगा, लेकिन राज्य सरकार के पास तत्काल व्यवस्था करने के रास्ते मौजूद हैं। यदि सेवारत शिक्षकों को TET में कुछ राहत और पर्याप्त अवसर मिलें तो बड़ी संख्या में शिक्षक पात्रता हासिल कर सकते हैं। उनका कहना है कि एक बार में हो या चार बार में, सरकार कम से कम दरवाजा तो खोले…। जब बैक डोर से शिक्षकों के तबादले की व्यवस्था हो सकती है तो TET के मामले में सेवारत शिक्षकों के लिए रास्ता क्यों नहीं बनाया जा सकता।

इसी नाराजगी के बीच अब शिक्षक संगठन आंदोलन के लिए मैदान में उतर रहे हैं। मनीष मिश्रा बताते हैं कि 9 सितंबर को एक ही दिन दो मोर्चों पर शिक्षक सेवा सुरक्षा न्याय पदयात्रा निकाली जाएगी…। बिलासपुर और सरगुजा संभाग के शिक्षक जशपुर जिले के बगिया में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के विधानसभा मुख्यालय स्थित निवास तक करीब दो किलोमीटर की पदयात्रा करेंगे..। मुख्यमंत्री निवास पहुंचने के बाद मांगें पूरी होने तक दिन-रात अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा।

वहीं रायपुर, दुर्ग और बस्तर संभाग के शिक्षक स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के दुर्ग स्थित गृह निवास तक शिक्षक सेवा सुरक्षा न्याय पदयात्रा एवं रैली निकालेंगे। करीब दो किलोमीटर की पदयात्रा के बाद शिक्षक मंत्री निवास पहुंचेंगे और मांगें पूरी होने तक अनिश्चितकालीन धरने पर बैठेंगे। शिक्षक नेताओं ने दो टूक कहा है कि मांगें पूरी होने तक शिक्षक धरना स्थल से नहीं हटेंगे।

कुल मिलाकर देखा जाए तो Gen Z से लेकर Millennials और Gen X तक शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी नाराजगी की अलग-अलग वजहें हैं। युवा अभ्यर्थी भर्ती और परीक्षा को लेकर परेशान हैं तो शिक्षक नौकरी, वेतन और सेवा शर्तो को लेकर..। एक नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहा है तो दूसरा नौकरी बचाने के लिए..!

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के कार्यकाल में विद्यार्थियों से सीधे संवाद की पहल हुई है। वे अनेक स्कूलों में गए हैं, छात्रों से बातचीत की है और शिक्षा व्यवस्था को करीब से देखने की कोशिश की है। ऐसे में यही संवाद शिक्षकों के साथ भी हो तो आंदोलन और सरकार के बीच रास्ता निकल सकता है..!

Gen Z हो, Millennials हों या Gen X, तत्काल जरूरत समाधान और भरोसे की है। शिक्षक न्यायालय के निर्णय से अलग रास्ता नहीं मांग रहे है…। उनकी मांग है कि निर्णय लागू करने की प्रक्रिया में सेवारत शिक्षकों को TET पात्रता हासिल करने के पर्याप्त अवसर मिलें..!

अब 9 सितंबर तक सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच संवाद होता है या नहीं, यह महत्वपूर्ण होगा। यदि संवाद की पहल होती है तो शायद बगिया और दुर्ग तक पहुंचने वाली पदयात्रा को रास्ते में ही रोका जा सकता है..! लेकिन यदि संवाद नहीं हुआ तो इस बार आंदोलन सिर्फ TET तक सीमित रहने की संभावना कम है..। क्योंकि TET ने शिक्षकों की पुरानी नाराजगी की कई परतों को एक साथ सामने ला दिया है और अब Gen Z से लेकर Gen X और Millennials तक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोग अपने-अपने कारणों से सरकार से समाधान की उम्मीद कर रहे हैं।