बिलासपुर..जिला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्यमंत्री के युक्तियुक्तकरण अभियान के बावजूद यदि किसी स्कूल में एक पद पर तीन-तीन व्याख्याता कार्यरत हों और उसके बाद भी दूसरे विद्यालय से प्रतिनियुक्ति पर शिक्षक बुला लिया जाए, तो यह केवल प्रशासनिक विसंगति नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। सरकंडा स्थित स्वामी आत्मानंद बालक शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय एक बार फिर ऐसे ही गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। इस बार मामला सीधे मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक पहुंच चुका है और शिकायत अब कलेक्टर संजय अग्रवाल के संज्ञान में है।

यह वही विद्यालय है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक विवादों से प्रदेशभर में सुर्खियां बटोरी हैं। कभी प्राचार्य के प्रभार को लेकर विवाद, कभी हाईटेक नकल कांड, कभी बाल श्रम से जुड़े आरोप और कभी प्रशासनिक फैसलों पर सवाल। इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के दौरान सामने आए हाईटेक नकल प्रकरण के बाद प्रदेश स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सुरक्षा व्यवस्था तक में बदलाव करना पड़ा था। अब एक बार फिर यही विद्यालय शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

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इस बार प्रतिनियुक्ति और अतिशेष शिक्षकों का मुद्दा

विद्यालय के वरिष्ठ जीवविज्ञान व्याख्याता राजेंद्र शर्मा ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 में दर्ज शिकायत में आरोप लगाया है कि विद्यालय में शासन के युक्तियुक्तकरण आदेशों की खुलेआम अनदेखी की गई। सरकार ने प्रदेशभर में विद्यार्थियों की संख्या के अनुरूप शिक्षकों की पदस्थापना सुनिश्चित करने के लिए अभियान चलाया था, लेकिन सरकंडा के इस विद्यालय में कथित रूप से उसका उल्टा हुआ।

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शर्मा का कहना है कि जीवविज्ञान विषय के एक स्वीकृत पद के विरुद्ध तीन-तीन व्याख्याता कार्यरत हैं, इसके बावजूद दूसरे विद्यालय से एक महिला व्याख्याता को प्रतिनियुक्ति पर इसी विद्यालय में संलग्न कर दिया गया। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया नियमों के विपरीत हुई और इसमें प्राचार्य तथा शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत रही।

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राजेंद्र शर्मा का कहना है कि उनकी विधिवत पदस्थापना इसी विद्यालय में है, लेकिन उन्हें लगातार हाशिए पर रखा गया। आरोप है कि उनका वेतन तक दूसरे विद्यालय से जारी कराया गया, जबकि बाहरी शिक्षकों को इसी विद्यालय में समायोजित किया जाता रहा। उन्होंने शिकायत में इसे सुनियोजित प्रताड़ना बताया है।

किडनी मरीज  के बावजूद नहीं मिली संवेदनशीलता

राजेंद्र शर्मा कई वर्षों से किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। सप्ताह में दो दिन उन्हें डायलिसिस कराना पड़ता है। शिकायत के अनुसार स्वास्थ्य स्थिति से विभाग पूरी तरह अवगत होने के बावजूद उन्हें राहत देने के बजाय ऊपरी मंजिलों में कक्षाएं लेने भेजा गया। उनका आरोप है कि बीमारी को भी उनके खिलाफ दबाव बनाने का माध्यम बनाया गया।

तीन साल से न्याय की तलाश, हर दरवाजा खटखटाया

शर्मा का कहना है कि उन्होंने पिछले तीन वर्षों में कलेक्टर, कमिश्नर, संयुक्त संचालक शिक्षा सहित कई अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत रखी, लेकिन समाधान नहीं मिला। उनका आरोप है कि पहले हुई जांच भी निष्पक्ष नहीं रही और रिपोर्ट ऐसी तैयार की गई जिससे वास्तविक शिकायतें दब गईं।

अब उन्होंने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से फिर गुहार लगाते हुए प्रतिनियुक्ति आदेशों, अतिशेष शिक्षकों की तैनाती, अपने साथ कथित भेदभाव और पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

कलेक्टर तक पहुंची शिकायत, जांच की तैयारी

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से दर्ज शिकायत अब बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल तक पहुंच चुकी है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मामले को गंभीरता से लिया गया है और जांच की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी चल रही है।

यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो सवाल केवल एक शिक्षक की प्रताड़ना का नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरा मामला जिला शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण, प्रतिनियुक्ति और प्रशासनिक पारदर्शिता की वास्तविक स्थिति को उजागर करेगा।

अब सबसे बड़ा सवाल…

जब मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद भी एक विद्यालय में कथित रूप से अतिशेष शिक्षकों की भरमार बनी रही, प्रतिनियुक्तियां जारी रहीं और एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा वरिष्ठ व्याख्याता वर्षों तक न्याय के लिए भटकता रहा, तब सवाल केवल एक स्कूल का नहीं बल्कि पूरे जिला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली का बन जाता है।

अब सबकी नजर कलेक्टर स्तर पर होने वाली जांच पर है। यह जांच तय करेगी कि मुख्यमंत्री के आदेशों की अनदेखी वास्तव में किसने की और यदि शिकायतें सही हैं तो जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी।