रायपुर (मनीष जायसवाल )। स्कूल शिक्षा विभाग ने बड़े पैमाने पर शिक्षकों के तबादले कर एक साथ कई उड़ते हुए तीरों के अपनी ही कुर्सी पर लेने का इंतजाम कर लिया है। वैसे भी प्रदेश की सियासत में मंत्रियों की कुर्सी की चर्चाएं बीते कुछ महीनों से सुर्खियों में हैं। वहीं शिक्षा के क्षेत्र के गृह नक्षत्र फिलहाल कुछ ठीक नहीं चल रहे यहां कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर जेन-जी पहले से सरकार से नाराज है। स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव का पुतला दहन हो चुका है और उनके इस्तीफे की मांग भी उठ चुकी है। ऐसे नाजुक माहौल में स्कूल शिक्षा विभाग ने 6 अगस्त को बैक डोर से करीब 700 शिक्षकों के तबादले कर एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। तबादलों की यह प्रक्रिया अब शिक्षक संगठनों के विरोध से आगे बढ़कर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनती जा रही है।

इस तबादला प्रक्रिया से नाराज गवर्नमेंट एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन, छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष कृष्ण कुमार नवरंग का कहना है कि शिक्षकों के ट्रांसफर में सबका साथ, सबका विकास का मूल मंत्र कहीं दिखाई नहीं दिया। उनका आरोप है कि बिना किसी ट्रांसफर पॉलिसी के किए गए इन तबादलों में समान अवसर और पारदर्शिता के सिद्धांत का पालन नहीं हुआ।

नाराजगी इस कदर बढ़ रही है कि शिक्षक संगठन आंदोलन की तैयारी के मूड में हैं। नवरंग ने 700 तबादलों की प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए कहा कि युक्तियुक्तकरण के लिए सरकार ने बाकायदा एसओपी जारी की थी और उसमें पदस्थापना की पूरी प्रक्रिया तय की गई थी। ऐसे में अब बैक डोर से किए गए तबादलों में जिला शिक्षा अधिकारियों के विकल्प पर शिक्षकों की पदस्थापना किस नियम के तहत की गई, यह स्पष्ट नहीं है।

शिक्षक नेता कृष्ण कुमार कहना है कि युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया को लेकर उस समय 23 शिक्षक संगठनों ने सरकार के सामने अपनी आपत्तियां रखी थीं। पूरी प्रक्रिया को तय समय सीमा में पूरा कराने के लिए प्रशासनिक स्तर पर भी व्यापक कवायद हुई। ऐसे में अब उसी व्यवस्था से अलग जाकर जिला शिक्षा अधिकारियों को विकल्प देकर पदस्थापना करने का निर्णय कई स्तरों पर असमंजस खड़े कर रहा है। यदि युक्तियुक्तकरण के समय जिला कलेक्टर और जिला पंचायत जैसी संस्थाओं की भूमिका तय थी, तो अब इस प्रक्रिया में उन्हें दरकिनार करने की जरूरत क्यों पड़ी, यह भी बताया जाना चाहिए।

शिक्षक नेता नवरंग का कहना है कि जब जिला शिक्षा अधिकारी के पास सामान्य रूप से शिक्षकों के तबादले का अधिकार नहीं है तो उन्हें विकल्प देने का औचित्य क्या है। सहायक शिक्षक के मामले में उन्हें नियोक्ता मान लिया जाए, लेकिन शिक्षक और व्याख्याता जैसे पदों पर इसी प्रक्रिया के जरिए पदस्थापना किस प्रावधान के तहत की जा सकती है? उनका तंज है कि विभाग ने मानो अपने लिए ऐसा नियम बना लिया है, जिसमें बदलाव के लिए किसी जटिल प्रक्रिया की जरूरत ही नहीं पड़ती।

गौरतलब है कि जून 2025 में राज्य सरकार ने वर्ष 2025 के लिए स्थानांतरण नीति को मंजूरी दी थी। इसमें स्थानांतरण की समय-सीमा, न्यूनतम सेवा अवधि, प्रतिशत सीमा, पारदर्शिता और अभ्यावेदन जैसी व्यवस्थाएं तय की गई थीं। हालांकि सामान्य स्थानांतरण नीति में स्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों को शामिल नहीं किया गया था। ऐसे में 6 अगस्त को जारी करीब 700 तबादलों का आधार क्या है और प्रशासनिक तबादले के लिए शिक्षकों का चयन किस प्रक्रिया के तहत किया गया, यही इस पूरे मामले का सबसे अहम बिंदु बन गया है।

शिक्षक संगठनों का कहना है कि यदि संबंधित शिक्षकों ने तबादले के लिए आवेदन नहीं किया था तो प्रशासनिक तबादले की जरूरत क्यों पड़ी…? प्रशासनिक तबादले की परिभाषा क्या है और इसके लिए चयन का आधार क्या रखा गया…? संगठनों की ओर से कुछ शिक्षकों को लाभ पहुंचाने के लिए बाकी शिक्षकों के साथ भेदभाव किए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर विभाग की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना बाकी है।

मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि सरकार ने युक्तियुक्तकरण को शिक्षकों की कमी दूर करने और जरूरत वाले स्कूलों तक शिक्षक पहुंचाने की बड़ी कवायद बताया था। इसी फैसले के विरोध में 23 शिक्षक संगठनों ने रायपुर के तूता धरना स्थल पर जमकर आंदोलन किया था..। उस समय युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया को लेकर शिक्षक संगठनों में व्यापक आक्रोश था, उसी के बाद बीच सत्र में करीब 700 तबादलों ने विरोध की आग को फिर हवा दे दी है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक दूसरा पहलू प्रशासनिक अमले की नाराजगी से भी जुड़ा है, जो फिलहाल खुलकर सामने नहीं आ रही…। युक्तियुक्तकरण को तय समय सीमा में पूरा कराने के लिए जिला प्रशासन से लेकर विकासखंड स्तर तक के कर्मचारियों ने लंबी कवायद की थी। कई जिलों में कलेक्टर घंटों काउंसलिंग में बैठे..। कई दौर की बैठके की है …! आपत्तियों के निराकरण से लेकर न्यायालयीन प्रकरणों तक शिक्षा विभाग के अधिकारी-कर्मचारी लगातार फाइलों और जवाब तैयार करने में जुटे रहे। ऐसे में अब उन्हीं पद स्थापनाओं के बाद अलग प्रक्रिया से 700 तबादले किए जाने को प्रशासनिक अमले की मेहनत पर पानी फेरने के रूप में देखा जा रहा है…। यही वजह है कि इस फैसले का असर सिर्फ शिक्षक संगठनों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है।

अब 700 तबादलों का तीर निकल चुका है। विभाग के सामने चुनौती सिर्फ तबादलों को सही ठहराने की नहीं, यह बताने की है कि इनका आधार क्या था, अधिकार किसके पास था और पूरी प्रक्रिया किस नियम के तहत पूरी की गई…। यदि इन बिंदुओं पर स्थिति साफ नहीं हुई तो मामला शिक्षकों की नाराजगी से आगे बढ़कर प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक गलियारों तक पहुंच सकता है। युक्तियुक्तकरण में जुटे अमले की मेहनत, शिक्षक संगठनों का बढ़ता आक्रोश और बीच सत्र में हुए 700 तबादले तीनों अब एक ही बिंदु पर आकर टिक गए हैं। तीर चल चुका है, अब चोट किसे लगेगी, इसका इंतजार शिक्षक संगठनों से लेकर सियासी गलियारों तक है..।