बिलासपुर (मनीष जायसवाल)। स्कूल शिक्षा विभाग में इस समय एक प्रशासनिक फैसला चर्चा में है। 20 जुलाई को लोक शिक्षण संचालनालय ने भृत्य से लेकर बाबुओं तक के तबादले का आदेश जारी किया। इनमें ऐसे कर्मचारी भी शामिल हैं जो लंबे समय से कथित तौर पर अटैचमेंट के आधार पर संचालनालय में काम कर रहे थे, जबकि उनका मूल पद अलग-अलग जिला स्तर के कैडर का था। अब उन्हें प्रशासनिक आधार पर लोक शिक्षण संचालनालय, नवा रायपुर में पदस्थ किया गया है।

संभव है यह फैसला अटैचमेंट की व्यवस्था समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम हो। यह भी हो सकता है कि VSK ऐप लागू होने के बाद विभाग संचालनालय की व्यवस्था को नए सिरे से व्यवस्थित करना चाहता हो। संचालनालय में काम बढ़ा होगा, इसलिए अतिरिक्त कर्मचारियों की जरूरत भी महसूस हुई होगी। विभाग के अपने प्रशासनिक कारण भी हो सकते हैं। आखिर बात मुख्यालय की थी, इसलिए इस फैसले पर कोई खास सवाल नहीं उठा।

मगर खबरों की दीवार के करीब जाने पर इतिहास से वर्तमान तक के कुछ ऐसे सवाल दिखाई देते हैं, जिन्हें समय के साथ टाल दिया गया। ऐसा महसूस होता है कि विभाग की प्राथमिकताएं कंगूरों को संवारने पर ज्यादा रहीं, जबकि पूरी व्यवस्था जिस नींव पर खड़ी है, उसकी ओर अपेक्षित ध्यान अब तक नहीं दिया गया।

बीते एक दशक में स्कूल शिक्षा विभाग का दायरा पहले से कहीं अधिक बढ़ चुका है। वर्ष 2015 में ट्राइबल शिक्षा के शिक्षकों का बड़ा हिस्सा स्कूल शिक्षा विभाग में शामिल हुआ। इसके बाद 2018 में पंचायत विभाग के अधीन कार्यरत करीब एक लाख सोलह हजार शिक्षा कर्मियों का संविलियन हुआ। अगले कुछ सालों में पूरी व्यवस्था स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन आ गई। 2020 के बाद बड़े पैमाने पर शिक्षकों की भर्ती हुई, स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय शुरू हुए, नई योजनाएं लागू हुई और विभाग की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती चली गई।

इसके साथ ही विभाग का काम भी कई गुना बढ़ गया। सेवा पुस्तिकाओं का संधारण, वेतन, अवकाश, पदोन्नति, स्थानांतरण, पेंशन, ऑनलाइन प्रक्रियाएं, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का क्रियान्वयन, मंत्रालय और संचालनालय से लगातार मांगी जाने वाली जानकारियां, बढ़ता पत्राचार और विभागीय नीतियों से जुड़े न्यायालयीन प्रकरण इन सबने जिला और विकासखंड शिक्षा कार्यालयों का काम पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा दिया। मैन्युअल व्यवस्था से कंप्यूटरीकरण और फिर कई मामलों में दोनों प्रणालियों के समानांतर संचालन ने भी कर्मचारियों का काम आसान नहीं किया। मंत्रालय और संचालनालय में लिए गए निर्णयों का सबसे अधिक बोझ भी जिला और विकासखंड स्तर के कार्यालयों पर ही पड़ा।

कुल मिलाकर विभाग का दायरा लगातार बढ़ता गया, मगर क्या उसी अनुपात में जिला और विकासखंड शिक्षा कार्यालयों के स्टाफ का भी विस्तार किया गया?

खबरों की दीवार पर अगला सवाल यहीं से शुरू होता है ..! जब शिक्षकों की संख्या बढ़ेगी तो सेवा से जुड़े काम भी बढ़ेंगे। वेतन, अवकाश, पदोन्नति, स्थानांतरण, पेंशन, न्यायालयीन प्रकरण और विभागीय पत्राचार भी बढ़ेंगे। फिर जिला और विकासखंड शिक्षा कार्यालयों में कर्मचारियों की संख्या आज भी पुराने ढांचे के अनुसार ही क्यों बनी हुई है?

प्रदेश के अधिकांश शिक्षक और सभी सहायक शिक्षक संवर्ग का वेतन आहरण विकासखंड शिक्षा कार्यालयों से होता है।हर महीने हजारों शिक्षकों का समय पर वेतन जारी करना आसान जिम्मेदारी नहीं है। पहले कई स्थानों पर इस काम के लिए शिक्षकों या कर्मचारियों को अटैच किया जाता था। अब विभाग के सख्त निर्देश और VSK ऐप लागू होने के बाद ऐसी व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। ऐसे में सीमित स्टाफ पर काम का दबाव और बढ़ गया है। कई बड़े विकासखंड शिक्षा कार्यालयों में समय पर वेतन जारी करना भी बड़ी प्रशासनिक चुनौती बनता जा रहा है।

कुछ समय पहले विभाग ने छात्रों की संख्या के आधार पर शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण किया। इसका उद्देश्य उपलब्ध मानव संसाधन का बेहतर उपयोग करना था। यह निर्णय अपनी जगह महत्वपूर्ण था। मगर क्या कभी जिला, विकासखंड और संभाग शिक्षा कार्यालयों के स्टाफ का भी ऐसा कोई आकलन किया गया..? क्या यह देखा गया कि पिछले दस सालों में वहां कितना काम बढ़ा और उसे संभालने के लिए कितने कर्मचारी चाहिए..?

दिलचस्प बात यह है कि संचालनालय में जरूरत महसूस होते ही प्रशासनिक आदेश जारी हो गया। इससे यह संदेश जाता है कि जहां विभाग ने आवश्यकता महसूस की, वहां निर्णय लेने में देर नहीं हुई।

मगर खबरों की दीवार पर आज भी एक सवाल जस का तस लिखा दिखाई देता है। जब जिला और विकासखंड शिक्षा कार्यालयों का काम कई गुना बढ़ चुका है, तब वहां के स्टाफ का पुनर्मूल्यांकन कब होगा?

शिक्षा व्यवस्था की असली तस्वीर मंत्रालय या संचालनालय से ज्यादा संभाग, जिला और विकासखंड शिक्षा कार्यालयों में दिखाई देती है। यहीं से शिक्षकों की सेवा संबंधी अधिकांश काम पूरे होते हैं और यहीं से सरकार की योजनाएं जमीन तक पहुंचती हैं। यदि यही कार्यालय सालों से पुराने स्टाफ ढांचे के भरोसे चलते रहे, तो इसका असर पूरी व्यवस्था पर पड़ना तय है।

अब जरूरत इस बात की है कि जैसे शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण किया गया, वैसे ही शिक्षा विभाग के प्रशासनिक ढांचे का भी वस्तुनिष्ठ आकलन हो। कहां स्टाफ बढ़ाने की जरूरत है, कहां नए पद स्वीकृत होने चाहिए और कहां कार्य विभाजन में बदलाव जरूरी है, इसका निर्णय विभाग को करना है। मगर इतना तय है कि बढ़ते काम के बीच पुराने ढांचे के भरोसे व्यवस्था को लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता।

इसलिए अब सवाल किसी एक तबादला आदेश का नहीं, यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा का है। खबरों की दीवार पर आज सबसे बड़ा सवाल यही लिखा दिखाई देता है। शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण हो गया, दफ्तरों का कब होगा..?