बिलासपुर। एक नगर निगम, एक शहर और दशहरे पर दो सरकारी रावण दहन! बिलासपुर में इस बार 60 फीट और 80 फीट के रावण के साथ राजनीतिक सवाल भी खड़े हो गए हैं। वर्षों से पुलिस मैदान में नगर निगम के सरकारी आयोजन की परंपरा रही है, लेकिन इस बार साइंस कॉलेज मैदान में भी सरकारी स्तर पर रावण दहन कराया जा रहा है। खास बात यह है कि इसी मैदान में अरपांचल लोक मंच वर्षों से अपने संसाधनों से दशहरा उत्सव आयोजित करता रहा है। ऐसे में दूसरा सरकारी आयोजन क्यों? करीब 24 लाख रुपये खर्च करने की जरूरत क्या थी? वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय केशरवानी ने इन सवालों के जरिए नगर निगम की व्यवस्था और भाजपा के जनप्रतिनिधियों के बीच संभावित श्रेय की राजनीति पर निशाना साधा है।

केशरवानी का सवाल है कि जब एक ही नगर निगम में पुलिस मैदान पर दशहरे का सरकारी आयोजन होता रहा है, तो इस बार दूसरा सरकारी आयोजन कराने का औचित्य क्या है? क्या शहर की सांस्कृतिक जरूरत इतनी बदल गई कि एक आयोजन पर्याप्त नहीं रहा, या फिर जनप्रतिनिधियों के बीच अपना प्रभाव दिखाने की प्रतिस्पर्धा ने दशहरे को भी राजनीतिक चर्चा में ला दिया है? भले ही इसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा न हो, लेकिन दो सरकारी आयोजनों ने इस आशंका को हवा जरूर दी है।

एक रावण परंपरा का, दूसरा सरकारी खर्च का!

साइंस कॉलेज मैदान के आयोजन पर करीब 24 लाख रुपये खर्च होने की बात सामने आने के बाद वित्तीय व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। एक ओर पुलिस मैदान का परंपरागत आयोजन, दूसरी ओर साइंस कॉलेज में दूसरा सरकारी आयोजन। नगर निगम को स्पष्ट करना चाहिए कि दोनों आयोजनों की जरूरत, लागत और वित्तीय आधार क्या है। जब शहर में सड़क, नाली, जलभराव, पेयजल और सफाई जैसी समस्याएं मौजूद हैं, तब दूसरे सरकारी आयोजन पर खर्च का औचित्य बताना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

केशरवानी ने स्पष्ट किया कि सवाल दशहरा या रावण दहन का विरोध करने का नहीं, बल्कि सरकारी खर्च और निर्णय की पारदर्शिता का है। साइंस कॉलेज मैदान में अरपांचल लोक मंच वर्षों से स्थानीय सहयोग से आयोजन करता रहा है। ऐसे में उसी स्थान पर सरकारी आयोजन खड़ा करने से पहले स्थानीय समिति से समन्वय और इसकी आवश्यकता पर विचार क्यों नहीं किया गया? यदि दूसरा आयोजन जरूरी था, तो उसका आधार जनता के सामने रखा जाना चाहिए।

24 लाख का हिसाब सार्वजनिक करे निगम

केशरवानी ने मांग की है कि नगर निगम बताए कि आयोजन के लिए करीब 24 लाख रुपये किस मद से जुटाए जा रहे हैं। यदि राशि कंपनी की सामाजिक उत्तरदायित्व निधि (सीएसआर) से मिल रही है, तो संबंधित कंपनी, स्वीकृति आदेश, राशि मिलने की तारीख और उपयोग की शर्तें सार्वजनिक हों। यदि राशि जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) या किसी अन्य मद से है, तो उसका भी स्पष्ट खुलासा किया जाए।

उन्होंने टेंडर, चयनित एजेंसी, निविदा में भाग लेने वाली एजेंसियों, कार्यादेश और भुगतान की शर्तों का ब्योरा भी मांगा है। महापौर और नगर निगम आयुक्त के बयानों में राशि के स्रोत को लेकर कोई अंतर है, तो प्रशासन उसे दूर करे। सवाल सिर्फ यह नहीं कि रावण कितना ऊंचा बनाया जा रहा है, बल्कि यह भी है कि आयोजन पर कितना खर्च हो रहा है और उस खर्च का आधार क्या है।

केशरवानी ने यह भी पूछा कि यदि नगर निगम क्षेत्र में दो सरकारी रावण दहन जरूरी माने गए हैं, तो दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है? साइंस कॉलेज मैदान का चयन किस आधार पर हुआ और क्या इस फैसले में जनहित को प्राथमिकता दी गई? इन सवालों के जवाब से ही आयोजन की प्रशासनिक जरूरत स्पष्ट होगी।

अरपांचल को अलग नगर निगम कब?

केशरवानी ने रावण दहन के मुद्दे के साथ अरपांचल को अलग नगर निगम बनाने के वादे पर भी सरकार को घेरा। उनके मुताबिक, अरपांचल के 24 वार्डों में एसईसीएल मुख्यालय, अपोलो अस्पताल, केंद्रीय विश्वविद्यालय और बहतराई का खेल स्टेडियम जैसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं। तेजी से विकसित हो रहे इस क्षेत्र में अब भी सड़क, नाली, जल निकासी, पेयजल और सफाई की समस्याएं बनी हुई हैं।

उन्होंने कहा कि भाजपा ने विधानसभा चुनाव के घोषणा पत्र में अरपा पार क्षेत्र के लिए अलग नगर निगम बनाने का वादा किया था। सरकार बताए कि गठन के लिए सर्वे, सीमांकन और प्रशासनिक प्रक्रिया कहां तक पहुंची है और इस वादे को पूरा करने की समयसीमा क्या है।

केशरवानी के मुताबिक, अरपांचल की जनता को केवल उत्सव और घोषणाएं नहीं, बेहतर प्रशासन और स्थायी विकास चाहिए। एक तरफ दूसरे सरकारी रावण दहन पर करीब 24 लाख रुपये के खर्च को लेकर सवाल हैं, दूसरी तरफ अलग नगर निगम की वर्षों पुरानी मांग पर स्पष्ट जवाब का इंतजार। अब नगर निगम और सरकार को बताना चाहिए कि दो आयोजनों की जरूरत क्या है, खर्च का हिसाब क्या है और अरपांचल को अलग नगर निगम देने का वादा कब पूरा होगा।