भाजपा ने स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ के प्रदेश प्रभारी बनाया है। यह सिर्फ रूटीन फेरबदल नहीं है। इसे राज्य की राजनीति में केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ मजबूत करने की सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है। प्रभारी के तौर पर उनके पहले रायपुर दौरे से साफ संदेश गया है कि राज्य भाजपा में ताकत का संतुलन और संगठन की प्राथमिकताएं नए सिरे से तय होंगी।

चुनावी जीत के बाद अक्सर सत्ताधारी दलों में सरकार और संगठन के बीच दूरी बनने लगती है। ऐसे में ईरानी जैसे मुखर और तेज-तर्रार राष्ट्रीय चेहरे की मौजूदगी से राज्य इकाई में अनुशासन और काम करने के तरीके को नई दिशा देने की कोशिश दिखती है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार के कामकाज के साथ संगठन को भी बराबर सक्रिय रखना इस दौरे का मुख्य मकसद लगता है। संकेत यह भी है कि केंद्रीय नेतृत्व छत्तीसगढ़ को अपने हाल पर नहीं छोड़ना चाहता। वह सीधी निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था बनाए रखना चाहता है।

सत्ता में आने के बाद किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती सरकार और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की होती है। जीत का जोश ठंडा पड़ते ही मंत्रियों की व्यस्तता और कार्यकर्ताओं की अनदेखी की शिकायतें उठने लगती हैं। ईरानी के दौरे का मुख्य राजनीतिक संदेश इसी संभावित तनाव को वक्त रहते थामना रहा।

छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए यह संतुलन और भी नाजुक है। मंत्रियों और नौकरशाही के फैसलों का सीधा असर जमीन पर पार्टी के जनाधार पर पड़ता है। अगर कार्यकर्ताओं की राय सरकार तक नहीं पहुंचेगी तो योजनाओं का राजनीतिक फायदा नहीं मिलेगा। इसलिए सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और जनता की नाराजगी के शुरुआती संकेत पहचानने के लिए दोनों के बीच लगातार संवाद जरूरी माना गया है।

सत्ता के केंद्रीकरण को रोकने के लिए स्मृति ईरानी ने हिदायत दी है कि राज्य सरकार के मंत्री नियमित रूप से प्रदेश भाजपा कार्यालय में बैठकर कार्यकर्ताओं और आम लोगों की समस्याएं सुनें।नीतिगत फैसलों और जनता की प्रतिक्रिया की समीक्षा के लिए मुख्यमंत्री, वरिष्ठ मंत्रियों और संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों का एक नियमित मंच बने।जिला और मंडल स्तर के कार्यकर्ता सरकारी योजनाओं के अमल पर नजर रखें और स्थानीय अड़चनें सीधे पार्टी मंच तक पहुंचाएं।

सत्ता मिलने के बाद जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों में आने वाली सुस्ती रोकने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने ‘रिपोर्ट कार्ड’ व्यवस्था को सख्ती से लागू करने की तैयारी की है। राज्य के वरिष्ठ नेताओं और विधायकों को इस तरह का केंद्रीय मूल्यांकन खटक भी सकता है। फिर भी संगठन को नतीजे देने वाला बनाए रखने के लिए इसे जरूरी माना गया है।

सत्ता में आते ही नेताओं और उनके समर्थकों में वीआईपी संस्कृति, लालबत्ती का मोह और आयोजनों में शक्ति-प्रदर्शन की होड़ आम बात हो जाती है। ईरानी ने इस प्रवृत्ति पर चोट करते हुए सख्त अनुशासन की रूपरेखा रखी है। नेताओं के रुतबे और समर्थकों के दबाव के बीच इस पर पूरी तरह अमल कराना व्यावहारिक राजनीति में आसान नहीं होगा। फिर भी इससे मूल कार्यकर्ताओं को यह संदेश जरूर जाता है कि पार्टी में बराबरी का सिद्धांत अब भी कायम है।

स्मृति ईरानी के इस दौरे से यह मैसेज भी गया है कि मंत्री और विधायक अपने काफिलों, बैठकों और सार्वजनिक जीवन में बेवजह के तामझाम से बचें, ताकि यह न लगे कि सत्ता मिलते ही पार्टी अपनी सादगी से भटक गई।गुटबाजी, प्रशासन से जुड़ी शिकायतें या आपसी मतभेद सार्वजनिक रूप से या मीडिया के सामने उठाने पर पूरी तरह रोक लगे। शिकायत सिर्फ पार्टी के अधिकृत मंचों पर रखी जाए, वरना सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। नेता अपने आसपास बिचौलियों और चापलूसों का घेरा न बनाएं और आम कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद रखें।

सत्ताधारी दल के लिए सिर्फ सरकार चलाना काफी नहीं होता। अपने वैचारिक जनाधार को मजबूत रखने के लिए उसे आक्रामक अभियान भी चलाने पड़ते हैं। ‘घुसपैठिए हटाओ-देश बचाओ’ अभियान इसी रणनीति का हिस्सा है। राष्ट्रीय स्तर के साथ इसे छत्तीसगढ़ के स्थानीय मुद्दों से भी जोड़ा जा रहा है। राज्य में यह अभियान खासकर बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल संभागों और सीमावर्ती इलाकों में आबादी के स्वरूप में बदलाव, अवैध प्रवासन और धर्मांतरण जैसे मुद्दों से जुड़ा है। राजनीतिक तौर पर इससे भाजपा का मूल वैचारिक एजेंडा फिर से सामने आता है। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में जनजागरण का मौका मिलता है और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में आना पड़ता है।

पार्टी इस अभियान को भाषणों तक सीमित नहीं रखना चाहती। वह इसके जरिए जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना चाहती है ।हर बूथ पर स्थानीय सामाजिक और आदिवासी समीकरणों को ध्यान में रखकर जागरूकता बैठकें होंगी।युवा मोर्चा और महिला मोर्चा को आगे रखकर पदयात्राएं निकाली जाएंगी और जानकारी वाली सामग्री बांटी जाएगी।ओडिशा, झारखंड और महाराष्ट्र से लगे जिलों में प्रवासन के आंकड़ों और स्थानीय आशंकाओं को चिह्नित कर राजनीतिक दबाव बनाया जाएगा।

ईरानी की नियुक्ति और उनके शुरुआती तीखे तेवर का असर पार्टी के भीतर के समीकरणों पर भी दिखेगा और राज्य की पूरी राजनीति पर भी।वर्षों से सक्रिय क्षेत्रीय क्षत्रपों और गुटों की खींचतान पर केंद्रीय नेतृत्व के कड़े रुख से लगाम लगेगी।’नो-वीआईपी’ रुख और सीधे संवाद से उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ेगा, जो सत्ता आने के बाद खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं।

मुख्यमंत्री साय की सौम्य छवि और ईरानी का सख्त संगठनात्मक नियंत्रण मिलकर ‘गुड कॉप-बैड कॉप’ जैसी भूमिका निभा सकते हैं। इससे प्रशासनिक फैसलों में तेजी आ सकती है।संगठन को लगातार अभियान मोड में रखकर भाजपा आने वाले नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों के लिए कार्यकर्ताओं को तैयार रख सकेगी।वैचारिक अभियानों से कांग्रेस को अपने पारंपरिक मुद्दों की जगह भाजपा के तय किए एजेंडे पर लड़ना पड़ सकता है।

छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश प्रभारी के तौर पर ईरानी का पहला दौरा सत्ता और संगठन के रिश्ते को नया रूप देने की दिशा में अहम कदम है। जीत के बाद पैदा होने वाली आत्ममुग्धता और ढिलाई तोड़ने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने कड़े अनुशासन, ‘रिपोर्ट कार्ड’ संस्कृति और वैचारिक आक्रामकता का जो मॉडल रखा है, वह पार्टी के लंबे हित साधने की कोशिश है।

स्थापित क्षेत्रीय नेताओं को इस केंद्रीय निगरानी में ढालना और ‘नो-वीआईपी’ जैसे निर्देशों पर जमीन पर पूरी तरह अमल कराना आसान नहीं होगा। फिर भी इस नई कार्यशैली ने साफ कर दिया है कि छत्तीसगढ़ भाजपा में अब सत्ता का केंद्र सिर्फ प्रशासनिक गलियारे नहीं रहेंगे। संगठन की जवाबदेही ही सत्ता के टिके रहने की कुंजी बनेगी।