दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में व्यवस्था दी है कि नियोक्ता (Employer) अपने उस कर्मचारी की ग्रेच्युटी का भुगतान तब तक रोकने का हकदार है, जब तक उसके खिलाफ चल रही न्यायिक या अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) पूरी न हो जाए। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम के एक पूर्व क्लर्क की याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।

​क्या है पूरा मामला?

​याचिकाकर्ता, जो हिमाचल प्रदेश सड़क परिवहन निगम में क्लर्क के पद पर तैनात था, उस पर सेवाकाल के दौरान ‘कंबाइंड प्री-मेडिकल टेस्ट (CPMT), 2006’ का प्रश्न पत्र लीक करने में शामिल होने का गंभीर आरोप था। इस मामले में उसके खिलाफ आपराधिक जांच और विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही, दोनों शुरू की गई थीं।

​हालांकि, बाद में पर्याप्त सबूतों के अभाव में उसे आपराधिक मामले में अदालत से बरी कर दिया गया था, लेकिन विभागीय जांच अभी भी लंबित थी। इसी आधार पर परिवहन निगम ने उसकी ग्रेच्युटी का भुगतान रोक दिया था।

​अदालत में याचिकाकर्ता के तर्क

​पूर्व कर्मचारी के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के नियम 69(1)(c) का उद्देश्य ग्रेच्युटी रोकना नहीं है, खासकर तब जब कर्मचारी को आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया हो। याचिकाकर्ता ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने निगम द्वारा ग्रेच्युटी रोकने के निर्णय को सही ठहराया था।

​सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: अंतिम आदेश तक भुगतान रोकना वैध

​जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:

  • ​कार्यवाही का पूर्ण होना अनिवार्य: ग्रेच्युटी का भुगतान तब तक रोका जा सकता है, जब तक कि विभागीय या न्यायिक कार्यवाही तार्किक परिणति (अंतिम आदेश) तक न पहुंच जाए।
  • ​बरी होना ही काफी नहीं: भले ही कर्मचारी आपराधिक मामले में बरी हो गया हो, लेकिन यदि विभागीय जांच (Departmental Inquiry) जारी है, तो अंतिम फैसले तक ग्रेच्युटी पर रोक लगाना नियमों के अनुकूल है।