रायपुर (मनीष जायसवाल) ।5 सितंबर आते ही शिक्षक अचानक बहुत खास हो जाता है। शिक्षक दिवस पर उसके सम्मान में कार्यक्रम होते हैं, उसे राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, उसके समर्पण और जिम्मेदारी की चर्चा होती है। लेकिन 5 सितंबर गुजरते ही वही शिक्षक फिर स्कूल की व्यवस्था, विभागीय निर्देशों और रोज बढ़ते गैर-शैक्षणिक कामों के बीच दिखाई देता है। शिक्षक दिवस की तारीफ और शिक्षक की वास्तविक स्थिति के बीच का यह अंतर अब समझने की जरूरत है।

 

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छत्तीसगढ़ हेडमास्टर फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष कमलेश सिंह बिसेन इसी बदलाव की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ को बने 25 साल हो चुके हैं और शिक्षक संगठनों का संघर्ष इससे भी पुराना है। शिक्षाकर्मी के दौर से शुरू हुआ संघर्ष संविलियन तक पहुंचा। 2018 में संविलियन हुआ तो लगा कि शिक्षक के संघर्ष का एक बड़ा पड़ाव पूरा हो गया है, लेकिन इसके बाद भी वेतन विसंगति, पदोन्नति, वरिष्ठता और सेवा से जुड़े कई मामले सामने आते रहे।

 

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बिसेन बताते हैं कि अब शिक्षक के सामने एक नई तरह की परेशानी खड़ी हो रही है। करीब 25 साल पहले शिक्षक स्कूल में शिक्षक था। आज धीरे-धीरे उसकी भूमिका में गैर-शैक्षणिक काम बढ़ते जा रहे हैं। पढ़ाने के साथ उसे कई तरह की जानकारी जुटानी है, रिपोर्ट बनानी है, ऑनलाइन काम करना है और विभाग से आने वाले अलग-अलग निर्देशों का पालन करना है..!

 

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इसी में वीएसके ऐप का मुद्दा भी जुड़ता है। बिसेन ने इसे प्रदेश स्तर पर उठाया है। यहां बात इस बात की नहीं है कि वीएसके ऐप में ऑनलाइन हाजिरी लग रही है या अब उसमें ऑफलाइन हाजिरी की सुविधा भी आ गई है। बात इससे बड़ी है..। बात शिक्षक और सरकार के बीच भरोसे की है।

 

शिक्षक की पहचान उसकी हाजिरी से नहीं है। उसकी पहचान इस बात से है कि वह स्कूल में बच्चों के साथ क्या कर रहा है। वह किस तरह पढ़ा रहा है, किस बच्चे को समझने में दिक्कत आ रही है, किस बच्चे को ज्यादा समय देना है और किस तरह कक्षा में पढ़ाई का माहौल बनाना है। हाजिरी जरूरी है, लेकिन शिक्षक का काम हाजिरी भरने से बहुत बड़ा है..।

 

छत्तीसगढ़ हेडमास्टर फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष कमलेश सिंह का कहना है कि एक तरफ शिक्षक को डिजिटल निगरानी में रखा जा रहा है और दूसरी तरफ उसी शिक्षक से उम्मीद की जा रही है कि वह विभाग के दस तरह के निर्देशों को अलग-अलग तरीके से समझकर पूरा करे। शिक्षक के पास दस सिर नहीं हैं कि वह एक साथ दस दिशाओं से आने वाले निर्देशों को संभाल सके। उसके पास एक ही समय है और उसी समय में उसे बच्चों को भी पढ़ाना है।

 

वीएसके ऐप में शिक्षक की हाजिरी दर्ज हो जाएगी। उसका समय दर्ज हो जाएगा। यह भी पता चल जाएगा कि वह स्कूल में मौजूद था। लेकिन इससे यह पता नहीं चलेगा कि उस दिन बच्चों ने कितना सीखा। कौन बच्चा पीछे रह गया, किसे शिक्षक ने अलग से समझाया और किस बच्चे ने पहली बार किसी सवाल का सही जवाब दिया, यह डिजिटल हाजिरी नहीं बता सकती।

 

इसलिए बात हाजिरी की नहीं है। बात यह है कि शिक्षक को किस नजर से देखा जा रहा है। अगर हर व्यवस्था की शुरुआत शिक्षक पर निगरानी से होगी तो शिक्षक और व्यवस्था के बीच भरोसा कैसे बनेगा।

 

बिसेन कहते हैं की बहुत शिक्षक समय से पहले पहुंच जाते हैं कई तो आधा घंटा पहले पहुंचते है और यह बात सही है कि कुछ शिक्षकों के लिए कभी 10-15 मिनट आगे आने-जाने में हमेशा फर्क मिल सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि शिक्षक कामचोर है। शिक्षक कहां से अपने स्कूल आता है और कैसे जाता है, इस बात को भी व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को समझना होगा। जल्दी स्कूल पहुंचने की होड़ में कई बार शिक्षक समय से पहले निकलता है, रास्ते में जल्दी करता है और कई बार तेज गति से वाहन चलाने की स्थिति बनती है। यह जल्दबाजी दुर्घटना का कारण बन सकती है। शिक्षक अगर सार्वजनिक साधन से आता-जाता है तो वहां भी समय पर पहुंचने की चिंता होती है। वाहन चालक पर भी यह दबाव रहता है कि गुरुजी को समय पर स्कूल पहुंचाना है। इस पूरी स्थिति को भी व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को समझना चाहिए।

 

बिसेन बताते हैं कि शिक्षकों की

पदोन्नतियां हुई, विभाग में प्रशासनिक तबादले किए गए, युक्तियुक्तकरण हुआ। व्यवस्था के नाम पर शिक्षक को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह भेजा गया। ऐसी कई परिस्थितियां आई कि शिक्षक अपने मूल निवास से दूर होता चला गया। घर से दूर स्कूल जाना, समय पर पहुंचने की चिंता और फिर स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के साथ विभागीय काम पूरा करना, यह सब शिक्षक की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। ऐसे में उसकी दो-चार मिनट की देरी को समझने से पहले उसकी पूरी परिस्थिति को समझना भी जरूरी है।

 

बिसेन का मानना है कि स्कूलों की निगरानी के लिए संकुल से लेकर विकासखंड और जिला स्तर तक व्यवस्था पहले से है। हर दिन स्कूल की जानकारी लेने की व्यवस्था है। ऐसे में नई डिजिटल व्यवस्था शुरू करने से पहले यह भी देखना चाहिए कि उससे शिक्षक का समय कितना बच रहा है और बच्चों की पढ़ाई को कितना लाभ मिल रहा है।

 

यही बात शिक्षक आंदोलन के तरीके पर भी लागू होती है। शिक्षक संगठनों ने आंदोलन करके बहुत कुछ हासिल किया है। 2018 का संविलियन इसका बड़ा उदाहरण है। उस समय पांच संगठनों ने साथ आकर सरकार पर दबाव बनाया था। बाद में 23 शिक्षक संगठन भी लंबे समय तक एक साथ आंदोलन में रहे, लेकिन युक्तियुक्तकरण जैसी प्रक्रिया को रोकना संभव नहीं हुआ।

 

बिसेन मानते हैं कि इसका मतलब आंदोलन खत्म कर देना नहीं है। आंदोलन का तरीका बदलने की जरूरत है। पढ़ाई बंद करके छुट्टी पर रहकर आंदोलन करना अंतिम विकल्प होना चाहिए। शिक्षक की अपनी तकलीफ और अपनी मांग के लिए लड़ाई जरूरी है, लेकिन उसकी लड़ाई का असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़े, यह शिक्षक भी नहीं चाहेगा। आज प्रतियोगिता का दौर है। बच्चों का समय भी महत्वपूर्ण है। इसलिए शिक्षक आंदोलन को बच्चों की पढ़ाई से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

 

लेकिन एक और बात भी उतनी ही जरूरी है। जब शिक्षक अपनी बात रखने के लिए लगातार अलग-अलग तरीकों से सरकार तक पहुंचता है, ज्ञापन देता है, बातचीत करता है, सामूहिक विरोध करता है और फिर भी उसकी बात नहीं सुनी जाती, तब आंदोलन की मजबूरी बढ़ती है। अंतिम विकल्प तक पहुंचने के बाद भी अगर शिक्षक की बात नहीं सुनी जा रही है तो इसकी जिम्मेदारी भी व्यवस्था को समझनी होगी। हर बार शिक्षक को ही दोषी मान लेना आसान रास्ता है। उसकी बात क्यों नहीं सुनी गई, वह अंतिम विकल्प तक क्यों पहुंचा, इस पर भी विचार होना चाहिए।

 

बिसेन की सोच है कि शिक्षक अपने शैक्षणिक काम को पूरी जिम्मेदारी से करे और गैर-शैक्षणिक कामों के खिलाफ अपनी आवाज अलग तरीके से उठाए। सत्याग्रह हो सकता है, सामूहिक विरोध हो सकता है, सरकार के सामने अपनी बात रखी जा सकती है और समाज को भी बताया जा सकता है कि शिक्षक से क्या काम लिया जा रहा है। आंदोलन ऐसा हो जिसमें शिक्षक की आवाज भी पहुंचे और बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित न हो।

 

शिक्षक संगठनों को भी अब अपनी लड़ाई को सिर्फ वेतन और सेवा शर्तों तक नहीं रखना चाहिए। शिक्षा कैसी हो, शिक्षक को पढ़ाने के लिए कितना समय मिले, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो और नीतियां बनाने से पहले शिक्षक की बात सुनी जाए, यह भी शिक्षक आंदोलन का हिस्सा होना चाहिए।

 

शिक्षक को कर्मचारी समझकर हर समय निगरानी में रखने की व्यवस्था से शिक्षा मजबूत नहीं होगी। शिक्षक को जिम्मेदारी भी देनी होगी और उस जिम्मेदारी के साथ भरोसा भी करना होगा।

 

5 सितंबर को हम शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहते हैं। फिर 6 सितंबर से उसे उसी भरोसे के साथ काम करने का मौका भी देना होगा। शिक्षक की डिजिटल हाजिरी दर्ज करने से ज्यादा जरूरी उसकी कक्षा में मौजूदगी है। हाजिरी मोबाइल पर दर्ज हो सकती है, लेकिन पढ़ाई शिक्षक के मन से ही होगी।

 

और जब गुरु खुद तकलीफ में हो तो उसकी सेवा का दायरा भी बढ़ जाता है। शिक्षक से समाज को बहुत कुछ देने की उम्मीद है, तो उसके हिस्से की तकलीफ को समझना भी समाज और व्यवस्था की जिम्मेदारी है..। यही अंतर समझने की जरूरत है।