बिलासपुर…जिले के एसएस पब्लिक स्कूल में कथित अनियमितताओं की शिकायतों की जांच करने पहुंची शिक्षा विभाग की टीम के सामने एक के बाद एक गंभीर खामियां उजागर हुईं। प्रारंभिक जांच में शिकायतकर्ता रंजेश सिंह की अधिकांश शिकायतें सही पाई गईं। जांच दल में शामिल एबीओ दीप्ति गुप्ता और संकुल प्रभारी कमलकांत शुक्ला ने स्कूल परिसर का निरीक्षण कर पालकों से बातचीत की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

जांच के दौरान पाया गया कि जिस स्थान को लाइब्रेरी बताया गया था, वहां विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय की जगह यूनिफॉर्म और निजी प्रकाशकों की किताबें रखी गई थीं। स्कूल परिसर के ऊपरी हिस्से में किरायेदारों के रहने की भी जानकारी मिली। बच्चों के खेलने के लिए निर्धारित मैदान नहीं मिला, जबकि बाहर और पालकों के सामने स्कूल को सीबीएसई से संबद्ध बताकर प्रचारित किए जाने की शिकायत भी सही पाई गई।

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पालकों ने जांच दल को बताया कि स्कूल से ही निजी प्रकाशकों की किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का दबाव बनाया जाता है। सरकार की ओर से मिलने वाली निःशुल्क पुस्तकों का वितरण भी नहीं किया गया। इतना ही नहीं, हर वर्ष एक्टिविटी फीस के नाम पर पांच हजार रुपये वसूले जाते हैं और प्रतिवर्ष फीस बढ़ा दी जाती है। यदि कोई अभिभावक 10 तारीख तक फीस जमा नहीं करता तो प्रतिदिन 10 रुपये लेट फीस वसूली जाती है, जिसकी सूचना नोटिस बोर्ड पर भी चस्पा मिली।

जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। स्कूल की प्रबंधन समिति (मैनेजमेंट कमेटी) के गठन को लेकर भी संदेह उत्पन्न हुआ। जब जांच दल ने संबंधित दस्तावेज मांगे तो स्कूल प्रबंधन उन्हें प्रस्तुत नहीं कर सका। इससे शासन के नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

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शिकायतकर्ता रंजेश सिंह ने आरोप लगाया कि यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है। उनका कहना है कि स्कूल प्रबंधन अभिभावकों की जेब पर लगातार आर्थिक बोझ डाल रहा है, जबकि सुविधाओं के नाम पर कुछ भी उपलब्ध नहीं है। मुख्यमंत्री की गाइडलाइन और जिला प्रशासन के निर्देशों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि इतनी गंभीर अनियमितताओं के बावजूद स्कूल वर्षों से संचालित हो रहा है तो क्या शिक्षा विभाग की मिलीभगत के बिना यह संभव है?

रंजेश सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जांच में सामने आई खामियों के आधार पर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो वे न्यायालय की शरण लेंगे। उनके अनुसार बच्चों और अभिभावकों का आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण किया गया है तथा शिक्षा के नाम पर केवल वसूली का खेल चल रहा है।

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वहीं, विकासखंड शिक्षा अधिकारी भूपेंद्र कौशिक ने स्वीकार किया कि प्रारंभिक जांच में शिकायतों में सच्चाई सामने आई है। उन्होंने कहा कि सीबीएसई मान्यता से जुड़े दावे, निजी प्रकाशकों की पुस्तकों का वितरण तथा अन्य कई बिंदुओं पर गंभीर अनियमितताएं मिली हैं। जांच समिति का विस्तृत प्रतिवेदन प्राप्त होते ही नियमानुसार कठोर कार्रवाई के लिए उच्च अधिकारियों को भेजा जाएगा। शिक्षा विभाग के निर्देशों के अनुरूप स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। जानकारी देते चले की रंजेश सिंह ने प्रकरण को सीएम हेल्पलाइन के माध्यम से शिकायत की थी। इसके बाद जिला शिक्षा विभाग में मामले को गंभीरता के साथ लेते हुए पुरानी टीम की जगह नई टीम का गठन किया और जाच का आदेश दिया था।

इस पूरे मामले ने निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शिक्षा विभाग जांच रिपोर्ट के आधार पर केवल नोटिस जारी करता है या फिर वास्तव में ऐसी कार्रवाई होती है, जो निजी स्कूलों में मनमानी पर अंकुश लगाने का उदाहरण बने।