छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में 10 मंत्रों का जप अनिवार्य करने पर बवाल: मनीष कुंजाम ने बताया ‘संविधान विरोधी’, आदिवासी संस्कृति का हवाला देकर आदेश वापस लेने की मांग

सुकमा।छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में नए शैक्षणिक सत्र (2026-27) से विभिन्न मंत्रों के जप को अनिवार्य किए जाने के राज्य सरकार के फैसले पर एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया है।
बस्तरिया राज मोर्चा के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने सरकार की इस नई व्यवस्था पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने इसे मासूम विद्यार्थियों और शिक्षकों पर जबरन थोपा जाने वाला कदम बताते हुए तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग की है। इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर अब पूरे प्रदेश में वैचारिक और राजनीतिक बहस बेहद तेज हो गई है।

अंबिकापुर और बस्तर के आदिवासी अंचलों में इस फैसले के विरोध की गूंज सुनाई देने लगी है। गुरुवार को आयोजित एक विशेष पत्रकार वार्ता (प्रेस कॉन्फ्रेंस) को संबोधित करते हुए पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने सरकारी आदेश की कॉपियों का हवाला देते हुए कहा कि नए नियम के मुताबिक स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा से लेकर छुट्टी होने तक अलग-अलग समय पर कुल 10 मंत्रों और वंदनाओं का जप अनिवार्य कर दिया गया है।
उन्होंने ब्योरा देते हुए बताया कि अब स्कूलों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के अलावा दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, महापुरुषों की जीवनी का वाचन, मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) मंत्र, गायत्री मंत्र तथा अंतिम में शांति मंत्र को भी दैनिक शैक्षणिक कार्यक्रम का हिस्सा बना दिया गया है।

आदिवासी नेता मनीष कुंजाम ने सरकार की इस नीति पर व्यावहारिक सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि इस नई व्यवस्था के कारण विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई-लिखाई और पाठ्यक्रम पूरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इस आदेश ने सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के सामने भी एक अजीब तरह का असमंजस और वैचारिक संकट पैदा कर दिया है। शिक्षकों को अब प्रतिदिन यह तय करने में भारी कठिनाई और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है कि वे स्कूल के सीमित समय में इन धार्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियों पर अधिक ध्यान दें या बच्चों के मूल नियमित शैक्षणिक कार्यों और विषयों को पूरा कराने पर ध्यान केंद्रित करें।

पूर्व विधायक ने इस विवादास्पद शासकीय आदेश को भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) भावना के पूरी तरह विपरीत और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताया है। उन्होंने सरकार को याद दिलाते हुए कहा कि भारत एक संप्रभु और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहां देश के संविधान में सभी धर्मों, आस्थाओं और विश्वासों का समान रूप से सम्मान किया जाता है।
उनका स्पष्ट दावा है कि किसी भी सरकारी संस्थान या शासकीय विद्यालय में इस प्रकार की धार्मिक व्यवस्थाओं को अनिवार्य करना संविधान की मूल प्रस्तावना और लोकतांत्रिक आत्मा के अनुरूप नहीं है।
मनीष कुंजाम ने बस्तर के संदर्भ में बात करते हुए विशेष रूप से रेखांकित किया कि छत्तीसगढ़ के मूल आदिवासी समाज की अपनी एक बेहद अनूठी, विशिष्ट और प्राचीन सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराएं हैं, जो प्रकृति पूजा पर आधारित हैं। इसलिए आदिवासी बच्चों को उनकी इच्छा के विरुद्ध किसी विशेष धार्मिक पहचान या कर्मकांड से जोड़ना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत और उचित नहीं ठहराया जा सकता।
उन्होंने मुख्यमंत्री और शिक्षा विभाग से इस पूरे निर्णय पर तुरंत गंभीरतापूर्वक पुनर्विचार करने और आदेश को वापस लेने की पुरजोर मांग की है।





