छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वन विभाग के अधिकारियों को उनकी सहमति के बिना छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज व्यापार एवं विकास सहकारी संघ में पदस्थ करने के आदेशों को निरस्त कर दिया है।

जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि संघ की गतिविधियां वन विभाग से जुड़ी होने, राज्य सरकार का नियंत्रण रहने और अधिकारियों के मूल विभाग में सेवा संबंधी अधिकार बने रहने मात्र से संघ के पद वन विभाग के नियमित संवर्ग का हिस्सा नहीं हो जाते। ऐसे में अधिकारियों को संघ में भेजने की पदस्थापना को सामान्य तबादला नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने इंदर प्रसाद बंजारे, अवधेश सिंह और मनवेंद्र मार्कंडेय सहित संबंधित अधिकारियों की याचिकाएं स्वीकार कर लीं। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से संबंधित तबादला और पदस्थापना आदेश निरस्त कर दिए हैं।

हालांकि, सक्षम प्राधिकारी को लागू कानून और सेवा नियमों के अनुरूप नया आदेश जारी करने की छूट भी दी गई है।

मामले के अनुसार, वन विभाग के कुछ अधिकारियों को छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज व्यापार एवं विकास सहकारी संघ में पदस्थ किया गया था।

इन अधिकारियों ने आदेशों को चुनौती देते हुए कहा कि संघ की अपनी अलग कानूनी पहचान है और वहां के पद वन विभाग के नियमित संवर्ग में शामिल नहीं हैं। इसलिए उन्हें संघ में भेजना सामान्य तबादला नहीं, बल्कि प्रतिनियुक्ति की श्रेणी में आता है। इसके लिए संबंधित अधिकारियों की सहमति आवश्यक है।

याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों के समर्थन में हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों एसएस कंवर, जेआर राठिया और एसआर बंजारे का हवाला दिया। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि संघ पर सरकार का नियंत्रण है और उसे वित्तीय सहयोग भी मिलता है।

संघ के लिए वन विभाग के स्वीकृत पदों में से पद निर्धारित किए गए हैं। इसलिए अधिकारियों को वहां भेजना प्रतिनियुक्ति नहीं, बल्कि संवर्ग के भीतर सामान्य पदस्थापना है। सरकार ने अपने पक्ष में मौलिक नियम 110 के प्रावधान का भी उल्लेख किया।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पदस्थापना को प्रतिनियुक्ति या सामान्य तबादला मानने का निर्धारण केवल आदेश में इस्तेमाल किए गए शब्दों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

इसके लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित पद किस स्थापना और संवर्ग का हिस्सा है तथा उस पर कौन-से सेवा नियम लागू होते हैं।

कोर्ट ने एसएस कंवर और एसआर बंजारे सहित पूर्व में दिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया। एसआर बंजारे से जुड़े पुनर्विलोकन मामले में भी इस दलील को स्वीकार नहीं किया गया था कि संघ के लिए पद स्वीकृत होने से वह वन विभाग का हिस्सा बन जाता है। हाईकोर्ट ने माना कि पूर्व फैसलों में तय कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का नियंत्रण, संघ के लिए स्वीकृत पदों की संख्या और अधिकारियों के मूल विभाग में सेवा संबंधी अधिकार बने रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संघ के पद वन विभाग के नियमित संवर्ग का हिस्सा हैं। इसलिए अधिकारियों की सहमति के बिना उन्हें संघ में पदस्थ करने के आदेश कायम नहीं रखे जा सकते।