Old Pension Scheme/लाखों सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाली की उम्मीदों पर केंद्र सरकार ने संसद में विराम लगा दिया है। लोकसभा में एक लिखित सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने स्पष्ट किया है कि सरकार पुरानी पेंशन व्यवस्था को दोबारा लागू करने के किसी भी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। सरकार का तर्क है कि पुरानी पेंशन को वापस लाने से आने वाले समय में सरकारी खजाने पर ‘असहनीय वित्तीय बोझ’ पड़ेगा, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं होगा।

सरकार के इस रुख ने उन कर्मचारी संगठनों को बड़ा झटका दिया है, जो लंबे समय से नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे।

विवाद की जड़ को समझें तो 1 जनवरी 2004 से पहले लागू पुरानी पेंशन योजना एक ‘डिफाइंड बेनिफिट’ स्कीम थी, जिसमें कर्मचारी को रिटायरमेंट के समय उसकी आखिरी सैलरी का 50 प्रतिशत हिस्सा पेंशन के रूप में मिलने की गारंटी थी। इसके लिए कर्मचारी के वेतन से कोई कटौती नहीं होती थी और महंगाई भत्ता बढ़ने के साथ पेंशन भी बढ़ती थी।

वहीं, 2004 के बाद लागू NPS एक बाजार आधारित योजना है, जिसमें कर्मचारी और सरकार दोनों का अंशदान होता है। कर्मचारियों का सबसे बड़ा डर यही था कि उनकी सामाजिक सुरक्षा शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर हो गई है, जिससे बुढ़ापे में मिलने वाली राशि अनिश्चित रहती है।

पुरानी पेंशन की मांग को लेकर देश के पांच राज्यों—राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश—ने पहले ही NPS छोड़कर पुरानी पेंशन बहाल करने का ऐलान कर दिया है। हालांकि, इन राज्यों के लिए राह आसान नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन पांचों राज्यों के हजारों करोड़ रुपये (जैसे राजस्थान के 53,403 करोड़ और छत्तीसगढ़ के 24,030 करोड़ रुपये) अभी भी पेंशन फंड रेगुलेटर (PFRDA) के पास जमा हैं। केंद्र और राज्यों के बीच इस फंड की वापसी को लेकर कानूनी पेच फंसे हुए हैं, जिससे इन राज्यों के कर्मचारियों के भविष्य पर भी संशय बना हुआ है।

NPS के प्रति बढ़ते असंतोष और पुरानी पेंशन की राजनीतिक मांग के बीच मोदी सरकार ने ‘बीच का रास्ता’ निकालते हुए ‘यूनिफाइड पेंशन स्कीम’ (UPS) को मंजूरी दी है, जिसे 1 अप्रैल 2025 से लागू कर दिया गया है। यह नई योजना हकीकत में पुरानी पेंशन की ‘गारंटी’ और NPS के ‘अंशदान’ मॉडल का एक मिलाजुला स्वरूप है। UPS के तहत 25 साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों को पिछले 12 महीनों के औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलने की गारंटी दी गई है। साथ ही, इसमें महंगाई राहत (DR) और न्यूनतम 10,000 रुपये पेंशन का प्रावधान भी जोड़ा गया है, जो कर्मचारियों को बाजार के जोखिमों से सुरक्षा प्रदान करता है।

फिलहाल, यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) को करीब 23 लाख केंद्रीय कर्मचारियों के लिए लागू किया गया है, लेकिन राज्य सरकारों के पास भी इसे अपनाने का विकल्प खुला है। सरकार को उम्मीद है कि UPS के जरिए वह कर्मचारियों की पेंशन सुरक्षा और सरकारी खजाने के वित्तीय संतुलन के बीच एक बेहतर तालमेल बिठाने में सफल रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकारें भी UPS को स्वीकार कर लेती हैं, तो देश के लगभग 90 लाख सरकारी कर्मचारियों से जुड़ा पेंशन विवाद हमेशा के लिए खत्म हो सकता है।