Nawazuddin Siddiqui Success Story: केमिस्ट की नौकरी से वॉचमैन का दर्द, और फिर ‘फैजल खान’ बनने का सफर

Nawazuddin Siddiqui Success Story।मुंबई: हिंदी सिनेमा में जब भी किसी ऐसे अभिनेता का जिक्र होता है जिसने बिना किसी गॉडफादर और पारंपरिक ‘हीरो लुक’ के पूरी दुनिया में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया, तो सबसे पहला नाम नवाजुद्दीन सिद्दीकी का आता है।
Nawazuddin Siddiqui Success Story।आज वह जिस मुकाम पर हैं, वहां पहुंचना किसी जादुई कहानी जैसा लगता है, लेकिन इस सफलता के पीछे डेढ़ दशक का ऐसा अंधकारमय संघर्ष छिपा है, जिसकी कल्पना भी रूह कंपा देती है।
एक समय पेट्रोकेमिकल कंपनी में केमिस्ट रहे नवाजुद्दीन ने बॉलीवुड का ‘सुपरस्टार’ बनने के लिए दिल्ली की सड़कों पर वॉचमैन की नौकरी तक की।
कस्बे की मिट्टी से हरिद्वार और वडोदरा का सफर
नवाजुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 19 मई 1974 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक छोटे से कस्बे बुढ़ाना में एक साधारण जमींदार और किसान परिवार में हुआ था। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े नवाजुद्दीन का झुकाव बचपन से ही अभिनय की ओर था, लेकिन उनके परिवार या माहौल में फिल्मों को करियर के रूप में देखना मुमकिन नहीं था। पढ़ाई के प्रति गंभीर नवाजुद्दीन ने हरिद्वार की गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रेजुएशन (B.Sc.) पूरा किया। इसके बाद नौकरी की तलाश उन्हें गुजरात के वडोदरा ले गई, जहां उन्होंने एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में ‘केमिस्ट’ के तौर पर काम करना शुरू किया। नौकरी अच्छी थी, केमिकल्स की जांच का काम भी ठीक चल रहा था, लेकिन उनके भीतर का कलाकार इस बंद कमरे की नौकरी से संतुष्ट नहीं था।
थिएटर का जुनून और दिल्ली में वॉचमैन की रातें
अभिनय की तड़प के कारण उन्होंने केमिस्ट की नौकरी छोड़ दी और दिल्ली का रुख किया। दिल्ली आकर वे थिएटर से जुड़ गए और बाद में देश के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSID) में दाखिला लिया। थिएटर से कला की बारीकियां तो सीखने को मिल रही थीं, लेकिन जेब खाली थी। रोजमर्रा के खर्च और खाने-पीने की दिक्कतों को दूर करने के लिए नवाजुद्दीन को दिल्ली में एक वॉचमैन (चौकीदार) के रूप में भी नौकरी करनी पड़ी। दिन में अभिनय का ककहरा सीखना और रातों को जागकर पहरेदारी करना—यह उनके संघर्ष का वह दौर था जिसने उन्हें जमीन से जुड़े किरदारों को जीने की ताकत दी।
मुंबई का कड़ा इम्तिहान: ‘सरफरोश’ से ‘मुन्ना भाई’ तक के छोटे रोल।Nawazuddin Siddiqui Success Story
साल 1999 में नवाजुद्दीन सपनों की नगरी मुंबई पहुंचे, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। इंडस्ट्री ने उन्हें आसानी से स्वीकार नहीं किया। करीब 12 से 15 सालों तक उन्होंने मायानगरी की खाक छानी। इस दौरान उन्हें आमिर खान की फिल्म ‘सरफरोश’ (1999) में एक छोटा सा क्रिमिनल का रोल मिला। इसके बाद ‘शूल’, ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ जैसी फिल्मों में भी वे चंद सेकेंड्स या मिनटों के बेहद छोटे किरदारों में नजर आए। काम मिलने के बावजूद पहचान नदारद थी और इंडस्ट्री में पैर जमाना नामुमकिन सा लग रहा था।
‘फैजल खान’ बनकर जब रातों-रात बदला इतिहास
लगातार असफलताओं और गुमनामी के बीच साल 2012 में निर्देशक अनुराग कश्यप की कल्ट फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ रिलीज हुई। इस फिल्म में ‘फैजल खान’ के मुख्य किरदार ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी को रातों-रात भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा और चर्चित चेहरा बना दिया। उनके बोलने का लहजा, आंखों की तीव्रता और संवाद अदायगी के दर्शक दीवाने हो गए। इसके बाद नवाजुद्दीन ने कभी मुड़कर नहीं देखा।
अंतरराष्ट्रीय फलक पर बुढ़ाना का लाल
’गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद नवाजुद्दीन ने ‘द लंच बॉक्स’, ‘किक’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘रमन राघव 2.0’, ‘मंटो’, ‘ठाकरे’ जैसी फिल्मों और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी ब्लॉकबस्टर वेब सीरीज में ऐसे किरदार निभाए जो हमेशा के लिए अमर हो गए। उनके इसी असाधारण अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (स्पेशल जूरी अवार्ड) से नवाजा गया।
फिल्मफेयर के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कान्स फिल्म फेस्टिवल और एमी अवार्ड्स जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर भी उनके काम को जमकर सराहा गया है। एक साधारण किसान का बेटा, जिसने कभी गुजारे के लिए केमिकल्स की जांच की, आज वह दुनिया के सामने अभिनय के नए मानक स्थापित कर रहा है।Nawazuddin Siddiqui Success Story





