बिलासपुर । महाराष्ट्रीयन परिवारों में कल से प्रारंभ हुए तीन दिवसीय महालक्ष्मी जेष्ठा गौरी एवं कनिष्ठ गौरी पूजन के कार्यक्रम के  दूसरे दिन महालक्ष्मी (ज्येष्ठा गौरी) पूजन के दूसरे दिन ज्येष्ठा नक्षत्र पर महालक्ष्मी की मुख्य पूजा और महानैवेद्य का विधान होता है। दूसरे दिन के मुख्य अनुष्ठान मुख्य पूजा और महाआरती का आयोजन होता है.

इस दिन माता को षोडशोपचार विधि से पूजा जाता है 16 प्रकार के फूलों में चंपा,चमेली, जाई,जूही, गुलाब,गेंदा, मोगरा, सेवन्ति, हरसिंगार गुलबक्शी, मदार, नाग चंपा, निशिगंध, डगर इत्यादि से श्रंगार किया गया,
इसी तरह 1616 पत्तों की जोड़ी में मोगरा, गुलाब, चंपा, चमेली, मदार, तुलसी, बेल, जय, जूही, हरसिंगार इत्यादि पत्तियों का ज्येष्ठा एवं कनिष्ठा तथा दोनों बच्चो कों 8-8 कि जोड़ियों में पत्तीयो का चढ़ावा किया गया.
इसके बाद मन्त्रोंचार और भव्य महाआरती की गई, विशेष नैवेद्य (भोग) में 16 प्रकार की सब्जी 16 प्रकार की चटनी 16 प्रकार का मिष्ठान एवं 16 प्रकार के नमकीन बनाए जाते हैं.

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परिवार की महिलाएं विशेष पकवान जैसे पुरणपोली, कद्दू की सब्जी,दाल-भाजी और लाडू,करंजी,अनारसा, पाती,साटोरी,वेणी,फनी, मोदक, श्रीखंड, बासुंदी, खोये जी जलेबी, मावा मिठाईया,आदि बनाकर माता को भोग लगाती हैं।आज़ के पूजन का धार्मिक महत्व यह है कि ज्येष्ठा नक्षत्र की देवता इंद्र (ऐश्वर्य और सामर्थ्य के प्रतीक) माने जाते हैं, इसलिए इस दिन वैभव और समृद्धि की प्राप्ति के लिए विशेष अनुष्ठान होते हैं।
आज के महा भोग में आम्बील के नाम से एक विशेष पदार्थ बनाया जाता है जो की महालक्ष्मी पूजन के लिए एक प्रमुख भोग नैवेद्य होता है.महालक्ष्मी पूजन की भोग सामग्री (नैवेद्य)महालक्ष्मी पूजन में दूसरे (मुख्य पूजा) और तीसरे दिन का भोग अलग-अलग और बेहद खास है.
चावल के आटे और गुड़ से बने अनारसे, रवा-बेसन के लड्डू और करंजी (गुझिया) माता को चढ़ाई जाती है। पंचामृत और खीर, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत तथा केसर- चावल की खीर मुख्य रूप से शामिल होती है।

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