बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य महिला आयोग की शक्तियों और उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि महिला आयोग के पास किसी शासकीय कर्मचारी की सेवा शर्तों को प्रभावित करने या उसके तबादले का आदेश देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने रायगढ़ जिले के एक प्रभारी प्राचार्य के खिलाफ आयोग द्वारा की गई तबादले की सिफारिश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि आयोग की भूमिका सहायता और सिफारिश प्रदान करने वाली है, न कि सेवा संबंधी बाध्यकारी आदेश जारी करने की।

क्या था पूरा विवाद?
यह मामला रायगढ़ जिले के पुसौर ब्लॉक स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पड़ीगांव का है। यहां व्याख्याता सह प्रभारी प्राचार्य के पद पर पदस्थ डिग्री लाल पटेल (डी.एल. पटेल) के खिलाफ उन्हीं के अधीन कार्यरत एक महिला व्याख्याता सौदामिनी गुप्ता ने महिला आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि प्राचार्य उन्हें छुट्टी नहीं देते, उनका वेतन रोका गया है, तलाक के बाद उनके नाम में सुधार नहीं किया जा रहा है और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है।

आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता प्राचार्य ने कोर्ट को बताया कि महिला आयोग ने उन्हें 4 जुलाई 2026 को नोटिस भेजकर 6 जुलाई को पेश होने के लिए कहा था। जब वे आयोग के समक्ष उपस्थित हुए, तो उन्होंने शिकायत की कॉपी और संबंधित दस्तावेज मांगे ताकि वे अपना पक्ष रख सकें। लेकिन उन्हें दस्तावेज देने या समय देने के बजाय, आयोग ने उसी दिन सुनवाई पूरी कर दी और रायगढ़ जिला शिक्षा अधिकारी को निर्देश दे दिया कि 15 दिन के भीतर प्राचार्य का तबादला किसी दूसरे ब्लॉक में कर दिया जाए। प्राचार्य का आरोप था कि उन्हें आदेश की कॉपी तक नहीं दी गई और उन्हें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से वंचित रखा गया।

सरकार ने भी माना—आयोग ने पार की ‘लक्ष्मण रेखा’
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से उपस्थित उप महाधिवक्ता ने भी मामले की गंभीरता को स्वीकार किया। उन्होंने कोर्ट के समक्ष माना कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि महिला आयोग ने अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। शासन के इस रुख के बाद याचिकाकर्ता का पक्ष और मजबूत हो गया।

हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण कानूनी पाठ
जस्टिस ए.के. प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अपने निर्णय में कहा कि राज्य महिला आयोग महिलाओं की शिकायतें सुन सकता है और उचित कार्रवाई के लिए संबंधित विभागों को सुझाव दे सकता है, लेकिन वह किसी न्यायाधीश की तरह पक्षकारों के अधिकारों का फैसला (न्याय निर्णयन) नहीं कर सकता। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि तबादला करना पूरी तरह से संबंधित विभाग और उसके सक्षम प्राधिकारी का विशेषाधिकार है।

अदालत ने कहा कि सीमित शक्तियों वाले आयोग केवल तथ्यात्मक जांच कर सरकार से कार्रवाई का अनुरोध कर सकते हैं, वे खुद विभागीय आदेश जारी नहीं कर सकते। इस आदेश के साथ ही हाईकोर्ट ने प्राचार्य के तबादले की सिफारिश को शून्य घोषित कर दिया।