EPF vs NPS: दिल्ली।रिटायरमेंट के बाद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने के लिए नौकरीपेशा लोगों के लिए समय रहते बचत और निवेश शुरू करना जरूरी है।

लेकिन सवाल यह है कि भविष्य के लिए पैसा कहां जमा किया जाए, ताकि लंबे समय में बड़ा फंड तैयार हो सके। कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) ऐसे दो विकल्प हैं, जिन पर नौकरीपेशा लोग विचार कर सकते हैं।

दोनों का उद्देश्य रिटायरमेंट के लिए वित्तीय सुरक्षा तैयार करना है, लेकिन इनके रिटर्न, जोखिम, निकासी और टैक्स के नियम अलग-अलग हैं।

मान लीजिए कोई व्यक्ति हर महीने 10,000 रुपये निवेश करता है और 30 साल तक यह सिलसिला जारी रखता है। इस दौरान उसके द्वारा जमा की गई कुल रकम 36 लाख रुपये होगी। अब सवाल है कि 30 साल बाद यह रकम कितनी हो सकती है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि निवेश किस योजना में किया गया है और उस पर कितना रिटर्न मिलता है।

कर्मचारी भविष्य निधि यानी EPF वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट बचत का एक प्रमुख विकल्प है। इसमें कर्मचारी और नियोक्ता निर्धारित नियमों के अनुसार योगदान करते हैं। EPF पर मिलने वाली ब्याज दर हर वित्त वर्ष के लिए तय की जाती है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 8.25 प्रतिशत ब्याज दर की घोषणा की गई थी।

यदि गणना के लिए यह मान लिया जाए कि अगले 30 वर्षों तक निवेश पर औसतन 8.25 प्रतिशत सालाना रिटर्न मिलता रहेगा और हर महीने 10,000 रुपये जमा किए जाएंगे, तो अनुमानित फंड करीब 1.5 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच सकता है। हालांकि, वास्तविक राशि ब्याज दर में होने वाले बदलाव, योगदान की प्रकृति और खाते के नियमों पर निर्भर करेगी।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि EPF में ब्याज दर हमेशा 8.25 प्रतिशत रहने की गारंटी नहीं है। इसकी समीक्षा समय-समय पर की जाती है। इसके अलावा, EPF में कर्मचारी का पूरा योगदान सीधे खाते में नहीं जाता, क्योंकि नियोक्ता के योगदान का एक हिस्सा लागू नियमों के अनुसार कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में भी जा सकता है। इसलिए हर महीने 10,000 रुपये के निवेश की गणना और वास्तविक EPF खाते की गणना में अंतर हो सकता है।

नेशनल पेंशन सिस्टम यानी NPS बाजार से जुड़ी रिटायरमेंट निवेश योजना है। इसमें जमा राशि को चुने गए विकल्प और एसेट एलोकेशन के अनुसार इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड और सरकारी प्रतिभूतियों जैसी परिसंपत्तियों में निवेश किया जाता है। इसमें रिटर्न की कोई निश्चित दर नहीं होती और निवेश का मूल्य बाजार के प्रदर्शन के साथ घट-बढ़ सकता है।

यदि कोई व्यक्ति हर महीने 10,000 रुपये निवेश करता है और 30 साल तक उसे औसतन 10 प्रतिशत सालाना रिटर्न मिलता है, तो मासिक निवेश के आधार पर उसका अनुमानित फंड करीब 2.26 करोड़ रुपये हो सकता है। वहीं, औसत सालाना रिटर्न 9 प्रतिशत रहने पर यह राशि लगभग 1.83 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

ये आंकड़े केवल अनुमान हैं, न कि सुनिश्चित रिटर्न। वास्तविक फंड बाजार के प्रदर्शन, निवेश विकल्प, शुल्क और योगदान के समय पर निर्भर करेगा। NPS में इक्विटी निवेश का अनुपात जितना अधिक होगा, संभावित रिटर्न के साथ बाजार का जोखिम भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

रिटायरमेंट पर पैसा निकालने के नियम

EPF और NPS के बीच एक बड़ा अंतर रिटायरमेंट के समय मिलने वाली रकम और निकासी के नियमों का है। EPF में पात्रता और लागू नियमों के अनुसार रिटायरमेंट पर जमा राशि निकाली जा सकती है। नौकरी के दौरान भी घर खरीदने, बच्चों की शिक्षा या शादी और कुछ चिकित्सा जरूरतों जैसी परिस्थितियों में निर्धारित शर्तों के तहत आंशिक निकासी की सुविधा मिलती है।

NPS में सामान्य निकासी के नियम खाते की श्रेणी और उस समय लागू नियामकीय प्रावधानों पर निर्भर करते हैं। पात्र सामान्य निकास के मामलों में निर्धारित शर्तों के अनुसार अधिकतम 60 प्रतिशत तक राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है और शेष राशि का उपयोग एन्युटी खरीदने में किया जाता है। एन्युटी के माध्यम से नियमित पेंशन मिल सकती है। हालांकि, निकासी की पात्रता, अनिवार्य एन्युटी की सीमा और अन्य शर्तें खाते के प्रकार तथा लागू नियमों के अनुसार अलग हो सकती हैं।

टैक्स छूट में क्या है अंतर?

EPF को सामान्य तौर पर EEE यानी निवेश, ब्याज और पात्र निकासी पर कर छूट वाली व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। हालांकि, यह छूट शर्तों के अधीन है। उदाहरण के लिए, गैर-सरकारी कर्मचारियों के मामले में कर्मचारी के सालाना EPF और VPF योगदान के कुल 2.5 लाख रुपये से अधिक होने पर अतिरिक्त योगदान से संबंधित ब्याज कर योग्य हो सकता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में अलग सीमा लागू होती है।

NPS में भी टैक्स बचत के विकल्प हैं। पात्र करदाताओं को लागू शर्तों के अनुसार आयकर अधिनियम की धारा 80CCD(1) के तहत लाभ मिल सकता है। इसके अतिरिक्त, धारा 80CCD(1B) के तहत पात्र व्यक्तिगत योगदान पर 50,000 रुपये तक की अतिरिक्त कटौती उपलब्ध रही है। नियोक्ता के योगदान के लिए धारा 80CCD(2) के तहत अलग प्रावधान हैं। इन लाभों की उपलब्धता चुनी गई कर व्यवस्था और उस समय लागू आयकर कानून पर निर्भर करती है।

NPS से रिटायरमेंट के समय निकाली गई रकम पर भी निर्धारित कर नियम लागू होते हैं। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर स्थिति में पूरी निकासी या पेंशन पर समान टैक्स नियम लागू होंगे।

यदि केवल अनुमानित फंड की तुलना करें, तो 10 प्रतिशत रिटर्न की धारणा पर NPS में संभावित रकम EPF की 8.25 प्रतिशत ब्याज दर पर आधारित गणना से अधिक दिखाई दे सकती है। लेकिन यह तुलना तभी उचित होगी, जब दोनों में निवेश की राशि, समय अवधि और योगदान का तरीका समान हो। NPS का अनुमानित रिटर्न बाजार के जोखिम के अधीन है, जबकि EPF की ब्याज दर हर वित्त वर्ष में तय की जाती है।

जो निवेशक बाजार के जोखिम से बचते हुए नौकरी के दौरान रिटायरमेंट बचत बनाना चाहते हैं, उनके लिए EPF उपयोगी विकल्प है। वहीं, लंबी अवधि में बाजार से जुड़े निवेश के जरिए रिटायरमेंट फंड बढ़ाने की संभावना तलाशने वाले लोग NPS पर विचार कर सकते हैं। दोनों योजनाओं की अपनी भूमिका है और पात्रता के अनुसार एक ही व्यक्ति दोनों में निवेश भी कर सकता है।

निवेश का फैसला लेते समय केवल अंतिम अनुमानित रकम नहीं, बल्कि जोखिम उठाने की क्षमता, टैक्स व्यवस्था, नौकरी की स्थिति, पेंशन की जरूरत और निकासी के नियम भी ध्यान में रखने चाहिए। याद रखें, 30 साल बाद मिलने वाला वास्तविक फंड भविष्य की ब्याज दरों और बाजार के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा।Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए. Cgwall अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है.