बिलासपुर। (मनीष जायसवाल) कहते हैं किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात उसे आपसे मिलने की कोशिश में लग जाती है। फिल्म में यह बात मोहब्बत के लिए कही गई थी। लेकिन लगता है स्कूल शिक्षा विभाग के कुछ खटराल अफसरों ने इसका उल्टा रास्ता पकड़ लिया है। वे इतनी शिद्दत से काम कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव की छवि शिक्षकों के बीच खराब हो जाए। मामला भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में हुई 2021 की नई भर्ती के परीविक्षा अवधि वाले उन शिक्षकों के तबादले से जुड़ा है, जिनकी भर्ती बस्तर और सरगुजा संभाग की जरूरत को देखते हुए की गई थी। अब इनमें से कई शिक्षकों को दूसरे संभागों और शहरी क्षेत्रों में भेज दिया गया है।
ट्रांसफर की इस प्रक्रिया को लेकर शिक्षकों के बीच चर्चा है कि आखिर सरकार की शिक्षक तबादला नीति है क्या और उसका आधार क्या है? बिलासपुर के अरपा रिवरव्यू में शिक्षकों की एक आम सी चाय पर हुई चर्चा में शिक्षक नेता रंजीत बनर्जी का कहना था कि संविधान सबको समानता का अधिकार देता है, लेकिन शिक्षकों के तबादले बिना किसी तय ट्रांसफर नीति और नियम के किए जा रहे हैं। उनका कहना था कि अफसरशाही इस तरह हावी हैं कि किसी को समझना भी जरूरी नहीं कि क्या सही और क्या गलत है। 2019 में भर्ती हुए परीविक्षा अवधि वाले शिक्षकों का भी ट्रांसफर कर दिया गया। इनमें से कुछ शिक्षकों के आपसी तबादले भी किए गए। रंजीत का तर्क है कि इस पूरी कहानी को हाल में हुए युक्तियुक्तकरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 2021 और 2023 की भर्तियों के बाद स्कूलों में पद और शिक्षकों की संख्या का हिसाब बदला। युक्तियुक्तकरण में ऐसे हजारों शिक्षक प्रभावित हुए, जो लंबे समय से एक ही स्कूल में सेवा दे रहे थे। इनमें वरिष्ठ शिक्षक भी थे, जिन्हें अपने स्कूल से बाहर होना पड़ा। कई शिक्षक आज भी उस प्रक्रिया के बाद पैदा हुई परेशानियों से जूझ रहे हैं। युक्तियुक्तकरण के समय शिक्षक अपनी बात लेकर सरकार तक पहुंचे। आंदोलन हुए। 23 शिक्षक संगठनों ने मिलकर विरोध किया।जिले से लेकर राजधानी रायपुर में आंदोलन हुआ। जिलों में पोल खोल अभियान चला। इसके बाद बड़ी संख्या में मामले अदालत तक पहुंचे।
मामला अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे शिक्षक भी हैं, जो नई जगह ज्वाइन नहीं करने के कारण निलंबित चल रहे हैं और कई को नोटिस दिए जा रहे हैं। इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा सवाल उस स्कूल का है, जहां से शिक्षक को हटाया गया। जिस शिक्षक ने लंबे समय तक उसी स्कूल में सेवा दी, युक्तियुक्तकरण में उसे बाहर कर दिया गया। अब उसी स्कूल में नए भर्ती शिक्षक का ट्रांसफर किया जा रहा है। रंजीत बनर्जी इसे लेकर कहते हैं, एक स्कूल से वरिष्ठ शिक्षक का युक्तियुक्तकरण, फिर उसी जगह किसी नए शिक्षक का ट्रांसफर, आखिर यह कौन सी पॉलिसी है? बस्तर और सरगुजा के शिक्षक इस मामले में खास तौर पर चर्चा में हैं। इन दोनों अंचलों में 2019 में बड़े पैमाने पर भर्ती हुई थी। बाद में युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया में परीविक्षा अवधि वाले जूनियर शिक्षकों को हटाया नहीं जा सकता था इसलिए वरिष्ठ को अतिशेष होने पर हटना पड़ा और कई शिक्षक अपने स्कूलों से बाहर हो गए। अब इन्हीं अंचलों के शिक्षकों को दूसरे स्थानों पर भेजे जाने की खबरों ने शिक्षकों के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। रंजीत बनर्जी का कहना है कि युक्तियुक्तकरण से प्रभावित शिक्षक आज इस हालत में हैं कि उन्हें लगता है।हमसे क्या भूल हुई और हमें सजा क्यों मिली? एक तरफ पुराने शिक्षकों को युक्तियुक्तकरण के नाम पर हटाया गया और दूसरी तरफ नए शिक्षकों के तबादले किए जा रहे हैं। कभी स्वैच्छिक, कभी आपसी और कभी प्रशासनिक तबादले हो रहे हैं। नियम और नीति को लेकर शिक्षक लगातार सवाल उठा रहे हैं।
वे कहते हैं कि शिक्षक सब देख रहे हैं। स्कूल शिक्षा विभाग को अंधेर नगरी चौपट राजा का खिताब पहले ही दिया जा चुका है। करना क्या है, कैसे करना है, इसका कोई एक रास्ता दिखाई नहीं देता। जिस अफसर को जो ठीक लगता है, वही सही हो जाता है। रंजीत का कहना है कि उन्होंने अविभाजित मध्य प्रदेश के समय दिग्विजय सिंह की सरकार से लेकर छत्तीसगढ़ बनने के बाद अजीत जोगी से लेकर भूपेश बघेल सरकार तक का दौर देखा है। उनका कहना है कि स्कूल शिक्षा विभाग में फैसलों को लेकर ऐसी स्थिति पहले देखने नहीं मिली। उनकी नाराजगी सिर्फ तबादलों तक नहीं है। उनका कहना है कि राज्य का सबसे बड़ा विभाग होने के बाद भी स्कूल शिक्षा विभाग जिस तरह फैसले ले रहा है, उससे सरकार की छवि पर असर पड़ सकता है। यही वह जगह है जहां सवाल सरकार से ज्यादा अफसरशाही पर उठता है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ने शिक्षकों से जुड़े कई मामलों में संवेदनशीलता दिखाने की कोशिश की है। लेकिन अगर विभाग के छोटे-छोटे मामलों में शिक्षक बार-बार परेशान होते रहे, उनकी बात आगे नहीं बढ़े और हर कदम पर कोई न कोई अड़चन खड़ी होती रहे तो इसका राजनीतिक नुकसान आखिर किसे होगा? शिक्षक किसी आदेश को सिर्फ कागज पर नहीं देखते। वे यह भी देखते हैं कि उस आदेश से उनकी जिंदगी में क्या बदला। युक्तियुक्तकरण में स्कूल से बाहर हुआ शिक्षक हो, ज्वाइनिंग को लेकर कार्रवाई झेल रहा शिक्षक हो या फिर अब तबादले का आदेश लेकर खड़ा नया शिक्षक इन सबके बीच एक बात समान है। वे स्कूल शिक्षा विभाग की तरफ देखते हैं और आखिर में सरकार का नाम लेते हैं। यही वजह है कि रंजीत बनर्जी की बात को सिर्फ एक शिक्षक नेता की नाराजगी मानकर छोड़ देना आसान नहीं है। उनका आरोप है कि स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली सरकार के लिए खुद मुसीबत खड़ी कर रही है। कुल मिलाकर राज्य का सबसे बड़ा विभाग अगर अपने ही शिक्षकों को बार-बार उलझाता रहा, तो विपक्ष को सरकार के खिलाफ मुद्दा ढूंढने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। कुल्हाड़ी बाहर से कोई नहीं ला रहा। स्कूल शिक्षा विभाग ही उसे सरकार के पैर के पास रख रहा है।