बिलासपुर (मनीष जायसवाल)  ।राजनीति में कोई फैसला अचानक नहीं होता। कई बार किसी बड़े निर्णय की जमीन उससे काफी पहले तैयार होने लगती है। नेतृत्व में बदलाव हो, संगठन में नई जिम्मेदारी हो या किसी नए चेहरे को आगे बढ़ाने की तैयारी, इन सबके पीछे आने वाले समय की राजनीति को ध्यान में रखा जाता है..। छत्तीसगढ़ में 2028 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन भाजपा के लिए अगले चुनाव की तैयारी का समय शुरू हो चुका है। गुजरात, उत्तराखंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन के प्रयोग के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि छत्तीसगढ़ में पार्टी आगे किस तरह की राजनीतिक रणनीति अपनाती है।

 

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2027 में भी देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में होने वाले चुनावों के बाद साल के अंत में हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी चुनाव होंगे। इन चुनावों में भाजपा के सामने महिला मतदाताओं और आदिवासी समाज को साथ लेकर चलने की रणनीति महत्वपूर्ण हो सकती है..। यही वह दौर होगा, जब महिला आरक्षण और महिला नेतृत्व की राजनीति भी ज्यादा चर्चा में होगी। भाजपा अगर इन राज्यों में महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने का कोई बड़ा प्रयोग करती है तो उसका असर 2028 के छत्तीसगढ़ चुनाव की रणनीति पर भी पड़ सकता है।

 

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इस चर्चा का एक बड़ा आधार महिला प्रतिनिधित्व है। देश में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू होने की दिशा में आगे बढ़ रही है। परिसीमन के बाद इसका असर विधानसभा और लोकसभा की राजनीति पर दिखाई देगा। ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने की जरूरत भी बढ़ेगी।

 

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छत्तीसगढ़ में भी महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व पिछले चुनाव में बढ़ा है। 2018 में विधानसभा में 13 महिला विधायक थीं। इनमें कांग्रेस की 10 और भाजपा की एक विधायक थीं, जबकि दो विधायक अन्य दलों से थीं। 2023 के चुनाव में महिला विधायकों की संख्या बढ़कर 19 हो गई। इनमें भाजपा की आठ और कांग्रेस की 11 महिला विधायक शामिल हैं..। लेकिन यहां एक बात महत्वपूर्ण है। महिला आरक्षण का मतलब सिर्फ आरक्षित सीटों पर महिलाओं को चुनाव लड़ाना नहीं है। राजनीति में असली बदलाव तब माना जाएगा, जब महिलाएं सत्ता के शीर्ष पदों तक पहुंचें।

 

यहीं से छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग संभव दिखाई देता है। क्या भाजपा 2028 के पहले या उसके आसपास छत्तीसगढ़ में किसी महिला को मुख्यमंत्री बनाने पर विचार कर सकती है..?

और अगर ऐसा करना ही है तो क्या पार्टी सामान्य महिला चेहरे की जगह आदिवासी महिला को आगे बढ़ाकर दो बड़े राजनीतिक संदेश एक साथ दे सकती है..?

 

यह संभावना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छत्तीसगढ़ की राजनीति में आदिवासी नेतृत्व की अपनी अलग जगह है। वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आदिवासी समाज से आते हैं। उनसे पहले अजीत जोगी मुख्यमंत्री रहे, जिनकी आदिवासी पहचान को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद भी रहा। ऐसे में विष्णु देव साय का आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में उभरना छत्तीसगढ़ की राजनीति में अलग महत्व रखता है।

 

साय की सबसे बड़ी ताकत उनकी सहज और सरल राजनीतिक छवि रही है। संगठन में लंबे समय तक काम करने का अनुभव, आदिवासी क्षेत्रों में स्वीकार्यता और भाजपा के साथ उनका पुराना जुड़ाव उनकी राजनीतिक पूंजी है। विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाना भी इसी राजनीतिक गणित का हिस्सा था।

 

सरकार के स्तर पर मोदी की गारंटी से जुड़ी योजनाओं का असर दिखाई देता है। महिलाओं के बीच महतारी वंदन योजना ने भाजपा के लिए एक मजबूत सामाजिक आधार तैयार किया है। ऐसे में महिला मतदाताओं के बीच भाजपा की पकड़ को देखते हुए महिला नेतृत्व की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

 

हालांकि सरकार के सामने अपनी चुनौतियां भी हैं। कर्मचारियों, युवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और बिजली से जुड़े मुद्दे समय-समय पर सरकार के सामने आते रहे हैं। तबादलों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर भी असंतोष की चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में 2028 के करीब पहुंचते-पहुंचते राजनीतिक परिस्थितियां क्या रूप लेती हैं, यह महत्वपूर्ण होगा।

 

यदि भाजपा नेतृत्व को कभी यह लगता है कि राज्य में नए राजनीतिक संदेश की जरूरत है तो नेतृत्व परिवर्तन उसके लिए एक विकल्प हो सकता है। ऐसी स्थिति में विष्णु देव साय को हटाए जाने के रूप में देखने के बजाय इसे उनकी भूमिका के विस्तार के रूप में भी पेश किया जा सकता है। उन्हें केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी, आदिवासी मामलों से जुड़ी भूमिका या संगठन में राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इससे भाजपा एक तरफ नेतृत्व में बदलाव कर सकती है और दूसरी तरफ साय की राजनीतिक स्वीकार्यता का भी इस्तेमाल जारी रख सकती है।

 

अगर नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति आती है तो अगली चर्चा चेहरे को लेकर होगी। यहीं भाजपा के पास एक ऐसा विकल्प मौजूद है, जिसका असर छत्तीसगढ़ से बाहर तक जा सकता है।

 

देश में कई महिलाएं मुख्यमंत्री बनी हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब, बिहार और जम्मू-कश्मीर तक महिलाओं ने मुख्यमंत्री के रूप में सरकार चलाई है। आदिवासी समाज से आने वाले कई नेता भी देश के अलग-अलग राज्यों में मुख्यमंत्री रह चुके हैं। लेकिन किसी आदिवासी महिला को अभी तक किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनने का अवसर नहीं मिला है..। यही वह जगह है, जहां भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग बन सकता है।

 

देश को पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति देने के बाद यदि भाजपा किसी राज्य में पहली आदिवासी महिला मुख्यमंत्री बनाती है तो इसका राजनीतिक संदेश बहुत बड़ा होगा। यह फैसला महिला प्रतिनिधित्व, आदिवासी नेतृत्व और भाजपा की सामाजिक राजनीति तीनों को एक साथ जोड़ देगा..। छत्तीसगढ़ इसके लिए सबसे स्वाभाविक राज्य दिखाई देता है। राज्य की आबादी में आदिवासी समाज की बड़ी हिस्सेदारी है और भाजपा ने आदिवासी नेतृत्व को पहले ही मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया है।

 

अब अगर इसी राज्य में किसी आदिवासी महिला को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो भाजपा यह संदेश दे सकती है कि आदिवासी नेतृत्व की राजनीति पुरुषों तक नहीं रुकती, उसमें महिलाओं की भी बराबर हिस्सेदारी है।

 

संभावित चेहरों की चर्चा करें तो सबसे पहले नाम गोमती साय का सामने आता है…।गोमती साय की राजनीतिक यात्रा जमीनी राजनीति से शुरू होकर लोकसभा और विधानसभा तक पहुंची है। उन्होंने पंचायत स्तर से राजनीति में अपनी जगह बनाई, लोकसभा सांसद बनीं और बाद में विधानसभा चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेस नेता को हराकर विधायक के रूप में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई..। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका शांत स्वभाव, संगठन के प्रति निष्ठा और जमीन से जुड़ा राजनीतिक अनुभव माना जा सकता है। वह भाजपा के लिए ऐसा चेहरा हो सकती हैं, जिसे अचानक सामने लाने पर भी पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं माना जाएगा।

 

दूसरा नाम रेणुका सिंह का है..। सरगुजा अंचल से आने वाली रेणुका सिंह आदिवासी राजनीति में आक्रामक और मुखर राजनीतिक तेवर के लिए जानी जाती हैं। केंद्र में राज्य मंत्री रह चुकी हैं और राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान बनी है। उनके पास चुनावी राजनीति के साथ केंद्र सरकार में काम करने का अनुभव भी है..। अगर भाजपा को ऐसा आदिवासी महिला चेहरा चाहिए, जिसके पास राज्य के साथ राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव भी हो तो रेणुका सिंह का नाम स्वाभाविक रूप से चर्चा में आ सकता है।

 

तीसरा नाम लता उसेंडी का है..। बस्तर से आने वाली लता उसेंडी के पास रमन सिंह सरकार में मंत्री रहने का प्रशासनिक अनुभव है। संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसी जिम्मेदारी संभालने के कारण उनकी संगठनात्मक पहचान भी मजबूत रही है। बस्तर की राजनीति में उनका अनुभव उड़ीसा विधानसभा और हिमाचल की प्रभारी रही है जो भाजपा के लिए एक अलग राजनीतिक आधार बनाता है।

 

इन तीनों नामों की अपनी-अपनी ताकत है। गोमती साय के पास जमीनी और चुनावी राजनीति का अनुभव है। रेणुका सिंह के पास केंद्र सरकार और राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव है। लता उसेंडी के पास प्रशासन और संगठन दोनों का अनुभव है..। फिर भी भाजपा की राजनीति को देखते हुए यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि मुख्यमंत्री का चेहरा इन्हीं नामों में से कोई एक होगा। भाजपा कई बार ऐसे चेहरे को आगे करती रही है, जिसकी चर्चा चुनाव से पहले बहुत ज्यादा नहीं होती..। यही कारण है कि इस पूरी चर्चा को संभावित राजनीतिक दिशा के रूप में देखना चाहिए, तय फैसला मानकर नहीं।

 

फिलहाल विष्णु देव साय मुख्यमंत्री हैं और 2028 का चुनाव भी अभी दूर है। आने वाले समय में राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं। पार्टी को सरकार के प्रदर्शन, संगठन की स्थिति और चुनावी समीकरण को देखते हुए निर्णय लेना होगा..। लेकिन अगर भाजपा 2028 के पहले छत्तीसगढ़ में नेतृत्व को लेकर कोई बड़ा फैसला करती है तो उसके सामने सिर्फ महिला मुख्यमंत्री बनाने का विकल्प नहीं होगा। उसके पास उससे बड़ा राजनीतिक संदेश देने का अवसर भी होगा।

 

देश में महिला मुख्यमंत्री पहले भी बनी हैं। आदिवासी मुख्यमंत्री भी कई राज्यों में बन चुके हैं। लेकिन आदिवासी महिला मुख्यमंत्री का पद अभी भी देश की राजनीति में खाली है..। ऐसे में छत्तीसगढ़ में किसी आदिवासी महिला को मुख्यमंत्री बनाना भाजपा के लिए एक ऐसा फैसला हो सकता है, जो राज्य की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की चर्चा बन जाए।

 

यह फैसला महिला आरक्षण की बहस को भी एक नया अर्थ दे सकता है। आरक्षण से महिलाओं को विधानसभा और संसद में अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, लेकिन सत्ता के शीर्ष पद पर महिला की मौजूदगी उस प्रतिनिधित्व को एक अलग ऊंचाई देगी।

 

भाजपा के सामने यहां एक और राजनीतिक अवसर है। छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन जैसी योजनाओं के जरिए पार्टी ने महिला मतदाताओं के बीच मजबूत आधार बनाया है। अब उसी आधार को राजनीतिक नेतृत्व से जोड़ने का संदेश दिया जा सकता है।

 

इसलिए आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीति में चर्चा सिर्फ यह नहीं होगी कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा। चर्चा यह भी हो सकती है कि क्या भाजपा महिला नेतृत्व को सत्ता के शीर्ष तक ले जाने का फैसला करती है और अगर करती है तो क्या वह किसी आदिवासी महिला को यह जिम्मेदारी देकर देश की राजनीति में नया अध्याय लिखती है।

 

अभी यह एक संभावना है, कोई घोषित फैसला नहीं। 2028 तक परिस्थितियां कई बार बदल सकती हैं। लेकिन अगर भाजपा सचमुच महिला और आदिवासी नेतृत्व को एक साथ आगे बढ़ाने का बड़ा राजनीतिक प्रयोग करना चाहती है तो छत्तीसगढ़ उसके लिए सबसे उपयुक्त जमीन हो सकती है..। और अगर ऐसा हुआ तो इतिहास में यह सिर्फ छत्तीसगढ़ की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज नहीं होगा। यह देश की पहली आदिवासी महिला मुख्यमंत्री के रूप में भी दर्ज होगा।