बेमेतरा। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के दशम प्रांतीय सम्मेलन के दूसरे दिन ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण, मानकीकरण एवं वृहद शब्दकोश निर्माण’ विषय पर आयोजित विचार-विमर्श सत्र में छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्दकोश निर्माण की परंपरा, उसके विकास और मानकीकरण की आवश्यकता पर गंभीर एवं सारगर्भित चर्चा हुई।
अपने विचार व्यक्त करते हुए साहित्यकार डॉ. देवधर महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ी शब्दकोश निर्माण की परंपरा पुरानी है। छत्तीसगढ़ी का प्रारंभिक शब्दकोश” ए लिस्ट आफ मोस्ट छत्तीसगढ़ी कामन वर्ड्स एंड डिक्शनरी” सन् 1939 में रेवरेंड ई. जी. मेंजेल द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इसके बाद समय-समय पर अनेक विद्वानों ने छत्तीसगढ़ी शब्द-संपदा को संकलित और व्यवस्थित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

डॉ. महंत ने कहा कि इन प्रयासों की दीर्घ परंपरा में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा का कार्य विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उनका वृहद शब्द-संग्रह मूलतः उनके उस महत्त्वपूर्ण शोधकार्य पर आधारित है, जिसे उन्होंने सन् 1972 में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में पी-एच.डी. की उपाधि के लिए प्रस्तुत किया था। उनके शोधप्रबंध का शीर्षक ‘छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन की शब्दावली’ था। उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा ने छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन से जुड़े हजारों शब्दों को केवल संकलित ही नहीं किया, बल्कि उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषायी संदर्भों को भी समझने का प्रयास किया। इस दृष्टि से उनका शब्दकोश छत्तीसगढ़ी भाषा की लोक-स्मृति, कृषि-संस्कृति और जनजीवन का महत्वपूर्ण भाषायी दस्तावेज बन जाता है।
डॉ. महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण की प्रक्रिया में एक ऐसे वृहद शब्दकोश की आवश्यकता है, जिसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों में प्रचलित शब्दों, उनके अर्थों, प्रयोगों, पर्यायों और सांस्कृतिक संदर्भों को वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित ढंग से स्थान मिले। इस दिशा में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा का कार्य भावी शब्दकोश निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

कार्यक्रम में उपस्थित अन्य वक्ताओं के विचारों के पश्चात सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात भाषाविद् डॉ. चित्तरंजन कर ने डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के भाषायी योगदान पर स्पष्ट शब्दों में कहा कि डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा छत्तीसगढ़ी के अधिकारी विद्वान् और भाषाविद् थे।उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा ने अत्यंत गहन अध्ययन, व्यापक क्षेत्र-अनुभव और दीर्घ अध्यवसाय के आधार पर छत्तीसगढ़ी शब्द-संपदा को संकलित किया। उनके द्वारा तैयार किया गया शब्दकोश छत्तीसगढ़ी भाषा के अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और निःसंदेह श्रेष्ठतम शब्दकोशों में उसका स्थान है।
डॉ. चित्तरंजन कर के इस स्पष्ट मत से सम्मेलन में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के भाषायी अवदान की विशिष्टता और महत्ता रेखांकित हुई। सम्मेलन में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि छत्तीसगढ़ी के व्याकरण, मानकीकरण और वृहद शब्दकोश निर्माण के भावी प्रयासों में पूर्ववर्ती विद्वानों के कार्यों का सम्यक् मूल्यांकन और उनका संरक्षण आवश्यक है।

छत्तीसगढ़ी भाषा को समृद्ध, वैज्ञानिक और मानकीकृत स्वरूप प्रदान करने की दिशा में सम्मेलन में व्यक्त विचारों ने यह संदेश दिया कि शब्दकोश केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि किसी समाज की भाषा, संस्कृति, लोकजीवन और सामूहिक स्मृति का जीवंत दस्तावेज होता है। इस दृष्टि से डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा का कार्य छत्तीसगढ़ की भाषायी विरासत की महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में सामने आता है।