रायपुर आ रहे राहुल गांधी- संगठन सृजन अभियान के बीच सवाल, क्या कांग्रेस में सेवा दल के आधुनिक रूप में लौटने का समय आ गया है…?

बिलासपुर:(मनीष जायसवाल) 21 जून को राहुल गांधी संगठन सृजन अभियान के तहत छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं। कार्यक्रम जिला कांग्रेस अध्यक्षों के प्रशिक्षण से जुड़ा है। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस इसे संगठन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में पेश कर रही है..। लेकिन इस कार्यक्रम के बहाने एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी सामने खड़ा होता है..! क्या कांग्रेस की समस्या सिर्फ संगठन की है, या नेतृत्व तैयार करने वाली व्यवस्था की भी है..?
पिछले एक दशक में कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक सुधारों की चर्चा कई बार हुई है। पार्टी के भीतर से भी समय-समय पर आवाजें उठती रही हैं कि संगठन को अधिक लोकतांत्रिक और जवाबदेह बनाने की जरूरत है..। राहुल गांधी भी लगातार नीचे से ऊपर तक संगठन को मजबूत करने की बात करते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस वास्तव में उस दिशा में आगे बढ़ पाई है..?

कांग्रेस के पास संगठन की कमी नहीं है। प्रदेश इकाइयां हैं, जिला अध्यक्ष हैं, ब्लॉक स्तर तक नेटवर्क है। ऐसे हजारों कार्यकर्ता हैं जो बरसों से पार्टी के साथ खड़े हैं। सत्ता में भी रहे और विपक्ष में भी। लेकिन इसके बावजूद पार्टी बार-बार नेतृत्व संकट और संगठनात्मक कमजोरी की चर्चा में क्यों घिर जाती है..? इसका एक कारण शायद यह है कि कांग्रेस में नेतृत्व पैदा करने की प्रक्रिया उतनी साफ दिखाई नहीं देती जितनी किसी बड़े राष्ट्रीय दल में होनी चाहिए।
पार्टी के भीतर लंबे समय से एक धारणा रही है कि शीर्ष नेतृत्व की नजर में आने वाला नेता अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ जाता है…। यह धारणा सही हो या गलत, लेकिन संगठन के भीतर इसकी चर्चा हमेशा रही है..। दूसरी तरफ पार्टी में ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में हैं जिन्होंने अपना पूरा राजनीतिक जीवन कांग्रेस को दिया। सत्ता रही तब भी साथ रहे, सत्ता गई तब भी साथ रहे। लेकिन संगठन में उनकी भूमिका अक्सर कार्यकर्ता से आगे नहीं बढ़ सकी, जबकि उनसे बाद में आए कई चेहरे राजनीति की सीढ़ियां तेजी से चढ़ते चले गए…!

यहीं से वह अंतर पैदा होता है जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए चिंता का विषय बन सकता है। जब कार्यकर्ता को यह विश्वास कम होने लगे कि संगठन में ऊपर जाने का रास्ता उसके काम और क्षमता से तय होगा, तब संगठन धीरे-धीरे केवल ढांचे में बदलने लगता है…।
शायद इसी वजह से राहुल गांधी के संगठन सृजन अभियान के बीच एक पुराना सवाल फिर सामने आ रहा है..! क्या कांग्रेस को सेवा दल जैसे संगठन को नए रूप में पुनर्जीवित करने की जरूरत है..? एक समय सेवा दल कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत माना जाता था। वह सिर्फ कार्यक्रम आयोजित करने वाला मंच नहीं था..। वह कार्यकर्ता निर्माण की पाठशाला भी था..। वहां प्रशिक्षण था, वैचारिक संवाद था और संगठनात्मक संस्कार भी थे। लेकिन समय के साथ उसकी भूमिका सीमित होती चली गई।

कांग्रेस के सामने चुनौती केवल नए चेहरे तलाशने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व तैयार करने की वह प्रक्रिया कैसे मजबूत हो, जो समय के साथ कमजोर पड़ती दिखाई देती है..। ऐसे लोगों की पहचान कैसे हो जिनकी पकड़ समाज में हो, जो संगठन के बीच स्वीकार्य हों और जिन्होंने जमीन पर काम किया हो…।
लेकिन सवाल सिर्फ सेवा दल का भी नहीं है। कांग्रेस के सामने वैचारिक स्पष्टता की चुनौती भी दिखाई देती है…। अलग-अलग राज्यों में पार्टी अलग-अलग राजनीतिक रूपों में दिखाई देती है। स्थानीय नेतृत्व अपनी परिस्थितियों के अनुसार फैसले करता है। यह लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है, लेकिन राष्ट्रीय दलों को अंततः एक साझा सोच भी बांधकर रखती है।
भाजपा की राजनीतिक ताकत पर चर्चा होती है तो उसके चुनावी संगठन के साथ-साथ उसके वैचारिक ढांचे का भी उल्लेख होता है..। कांग्रेस के सामने भी यह सवाल है कि क्या उसके पास ऐसा कोई मंच है जो लगातार विचार पैदा कर रहा हो, कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित कर रहा हो और आने वाले वर्षो की राजनीतिक दिशा पर काम कर रहा हो..?
संगठन सृजन अभियान ऐसे समय में शुरू हुआ है जब कांग्रेस लगातार संगठन को मजबूत करने की बात कर रही है। लेकिन संगठन सिर्फ पदाधिकारियों की सूची से नहीं बनता। किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसकी वह व्यवस्था होती है जो कार्यकर्ता से नेता और नेता से नेतृत्व तैयार करती है..। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह अभियान सिर्फ प्रशिक्षण तक सीमित रहता है या कांग्रेस के भीतर नेतृत्व निर्माण की व्यापक बहस को भी आगे बढ़ाता है..।
लेकिन बहस का केंद्र आखिरकार वहीं पहुंचता है। क्या कांग्रेस संगठन में बरसों काम करने वाले कार्यकर्ताओं और दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को आगे आने का अधिक अवसर दे पाएगी…? क्या सेवा दल या उसके समान कोई ढांचा फिर से नेतृत्व निर्माण और वैचारिक प्रशिक्षण की भूमिका निभा पाएगा..? और क्या पार्टी अपने भीतर ऐसी व्यवस्था विकसित कर पाएगी जो नेतृत्व को ऊपर से तय करने के बजाय नीचे से विकसित होने का अवसर दे..?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं…। लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न गांधी परिवार का विकल्प खोजने का नहीं है। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पार्टी ऐसी व्यवस्था बना सकती है जो भविष्य में लगातार नया नेतृत्व पैदा करती रहे..। क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसके शीर्ष नेताओं से नहीं, वह उस व्यवस्था से बनती है जो हर पीढ़ी में नए कार्यकर्ता, नए विचार और नया नेतृत्व तैयार करती है..! राहुल गांधी का छत्तीसगढ़ दौरा एक प्रशिक्षण कार्यक्रम भर हो सकता है। लेकिन यदि इसके बहाने कांग्रेस अपने संगठनात्मक भविष्य पर गंभीरता से विचार करती है, तो यह कार्यक्रम एक बड़े राजनीतिक विमर्श की शुरुआत भी बन सकता है…।





