वेतन से कटौती, खाते में जमा नहीं—डीईओ दफ्तर से जुड़ा सीजीपीएफ मामला हाईकोर्ट पहुँचा
शिक्षक की याचिका पर सख्त टिप्पणी, चार हफ्ते में जवाब तलब—शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल

बिलासपुर.. शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। एक व्याख्याता ने अपने ही वेतन से की गई कटौती के बावजूद राशि खाते में जमा न होने का आरोप लगाते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। मामला सामने आने के बाद न केवल जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं, बल्कि विभागीय जवाबदेही को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
वेतन से कटौती, खाते में नहीं जमा
पीएम श्री स्वामी आत्मानंद विद्यालय, मस्तूरी के व्याख्याता संजय पाण्डेय ने उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ में याचिका दायर कर बताया कि उनके वेतन से हर माह सीजीपीएफ की राशि काटी जा रही थी, लेकिन यह राशि उनके खाते में नियमित रूप से जमा नहीं की गई। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, जिससे उन्हें आर्थिक और प्रशासनिक दोनों स्तर पर परेशानी का सामना करना पड़ा।
प्राचार्य पर सहयोग न करने का आरोप
व्याख्याता ने बताया कि इस संबंध में उन्होंने कई बार प्राचार्य टी संवर्ग जयप्रकाश ओझा को लिखित आवेदन दिए, लेकिन न तो राशि की जानकारी दी गई और न ही किसी प्रकार का समाधान किया गया। आरोप है कि जब कोषालय में जमा चालान की प्रति मांगी गई, तब भी स्पष्ट रूप से देने से इनकार कर दिया गया।
यहां तक कि सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगे जाने पर भी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे मामले की पारदर्शिता पर और सवाल खड़े हो गए।
उच्च अधिकारियों पर संरक्षण के आरोप
मामले में अपीलीय अधिकारी एवं जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे पर भी आरोप लगे हैं कि उन्होंने प्राचार्य के इस कृत्य पर कार्रवाई करने के बजाय उसे संरक्षण दिया। व्याख्याता ने कलेक्टर, संयुक्त संचालक शिक्षा रामायण प्रसाद आदित्य और संचालक लोक शिक्षण को भी आवेदन देकर राशि उपलब्ध कराने की मांग की, लेकिन वहां से भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
हाईकोर्ट की सख्ती, चार सप्ताह में जवाब तलब
मामले में जब कोई समाधान नहीं निकला, तो व्याख्याता स्वयं उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के समक्ष उपस्थित हुए। न्यायमूर्ति विभु दत्त गुरु की बेंच ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि वेतन से कटौती तो हुई है, लेकिन राशि संबंधित खाते में जमा नहीं की गई। इस पर न्यायालय ने राज्य शासन को चार सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया है और अगली सुनवाई की तारीख 30 जून निर्धारित की है।
राज्य शासन और कलेक्टर बिलासपुर की ओर से इस मामले में अधिवक्ता सुयशधर बड़गंइया ने पैरवी की।
विभागीय भूमिका पर गहराते सवाल
यह पूरा मामला शिक्षा विभाग की जानकारी में पहले से होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई न होना अब बड़े सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि उच्च अधिकारियों द्वारा प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई न करने से विभाग की साख प्रभावित हो रही है। ऐसे में जिम्मेदारी केवल एक स्तर तक सीमित न रहकर पूरे तंत्र पर आ जाती है।
यह मामला सिर्फ एक शिक्षक के वेतन कटौती का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही का परीक्षण बन गया है। जब सरकारी कर्मचारी की ही राशि सुरक्षित नहीं रह पा रही, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायालय के निर्देश के बाद शासन और संबंधित विभाग क्या कदम उठाते हैं।





