बिलासपुर : (मनीष जायसवाल) टीईटी को लेकर शिक्षक समाज में एक नया विवाद धीरे-धीरे सामने आ रहा है, जो अब खबरों की दीवार पर दिखाई देने लगा है। सोशल मीडिया पर कुछ नए शिक्षक संगठन दूसरे शिक्षक संगठनों को चेतावनी दे रहे हैं कि टीईटी पात्र शिक्षकों की पदोन्नति रोकने या सीमित करने का प्रयास बंद नहीं हुआ तो अब तक हुई पदोन्नतियों और डेढ़ लाख से अधिक शिक्षा कर्मियों के संविलियन को भी अदालत में चुनौती दी जाएगी..! गैर-टीईटी शिक्षकों की पदोन्नति को नियम विरुद्ध बताते हुए उन्हें रद्द कराने की कानूनी लड़ाई की बात कही जा रही है।

दूसरी तरफ ऐसे भी हजारों शिक्षक हैं, जो गांव के गुरुजी के रूप में पांच-सात सौ रुपये से अपना सफर शुरू करके आज यहां तक पहुंचे है..। जब उनकी नियुक्ति हुई थी, तब टीईटी की अनिवार्यता तो दूर, कई नियुक्तियों में डीएड और बीएड भी जरूरी नहीं था। पहली से पांचवीं तक पढ़ाने के लिए 12वीं और छठवीं से आठवीं तक के लिए स्नातक की योग्यता पर्याप्त थी और भर्ती एकदम सरल थी। 2008 में व्यापम से परीक्षाएं शुरू हुई। इनमें कई शिक्षक सेवानिवृत्त हो चुके हैं और बड़ी संख्या में शिक्षक 15 से 25 साल तक सेवा पूरी कर चुके हैं। अब नई व्यवस्था में उनके सामने टीईटी की अनिवार्यता खड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के फैसले के बाद जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच साल से अधिक समय बाकी है, उनके लिए टीईटी सेवा में बने रहने से जुड़ गई है। टीईटी पास नहीं करने की स्थिति में आने वाले समय में उनकी सेवा पर संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे में पुराने शिक्षक के लिए यह सिर्फ पदोन्नति का मुद्दा नहीं है, उसकी नौकरी और परिवार की आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल है..!

खबरों की दीवार पर अब एक तस्वीर साफ दिखाई दे रही है..। एक तरफ टीईटी पास करके 2019 में नियमित भर्ती हुआ शिक्षक अपने पदोन्नति के अधिकार की बात कर रहा है और दूसरी तरफ 1996 के बाद से सेवा कर रहा पुराना शिक्षक अपनी नौकरी बचाने की चिंता में है। एक कानूनी योग्यता की बात कर रहा है तो दूसरा लंबे अनुभव और सेवा की सुरक्षा की। दोनों की अपनी जगह चिंता है। लेकिन जब एक की लड़ाई दूसरे के खिलाफ खड़ी होने लगे तो बात सिर्फ टीईटी की नहीं रह जाती। बात शिक्षक समाज के भीतर बढ़ती दूरी की हो जाती है।

टीईटी से प्रभावित शिक्षक की चिंता को समझना जरूरी है..। जिस समय उसकी नियुक्ति हुई, उस समय भर्ती और पदोन्नति के नियमों में टीईटी अनिवार्य नहीं थी। उसने उसी व्यवस्था के आधार पर मामूली वेतन में नौकरी शुरू की। करीब तीन दशक की सेवा के बाद उसके सामने नई शर्त खड़ी हो गई है। किसी शिक्षक ने 20 साल से अधिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाया है, किसी ने 25 साल। अब नौकरी पर संकट आएगा तो असर सिर्फ उस शिक्षक पर नहीं पड़ेगा, उसके पूरे परिवार की आर्थिक व्यवस्था इससे जुड़ी है। इसलिए सेवा सुरक्षा की मांग को सिर्फ पदोन्नति रोकने की मांग के रूप में देखना ठीक नहीं होगा।

इसी तरह टीईटी पास कर चुके शिक्षक का पदोन्नति का अधिकार भी अपनी जगह है। वह अपनी पात्रता के आधार पर आगे बढ़ना चाहता है। यदि वह जूनियर है और पात्रता पूरी करता है तो वह पदोन्नति पाकर वरिष्ठ पद पर पहुंच सकता है। उसकी चिंता को भी गलत नहीं कहा जा सकता..। लेकिन अगर ऐसी स्थिति बनती है कि संस्था में लंबे समय से सेवा कर रहा वरिष्ठ शिक्षक नए नियुक्त शिक्षक को रिपोर्ट करे, तो स्वाभाविक रूप से संस्थागत टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में रास्ता क्या है..? रास्ता यह नहीं हो सकता कि एक शिक्षक का अधिकार दूसरे शिक्षक के खिलाफ खड़ा कर दिया जाए..!

छत्तीसगढ़ में शिक्षकों का संघर्ष आज से शुरू नहीं हुआ है। शिक्षा कर्मी आंदोलन का करीब तीन दशक का इतिहास है..। इस दौरान सहायक शिक्षक, शिक्षक और व्याख्याता अलग-अलग समय पर अलग-अलग मुद्दों को लेकर संघर्ष करते रहे हैं। नियमित शिक्षकों के जैसे वेतनमान, संविलियन, पुरानी पेंशन में पूर्व सेवा की गणना, सहायक शिक्षकों की वेतन विसंगति, पदोन्नति, भर्ती नियमों में सुधार और सेवा सुरक्षा जैसे मुद्दे इसी लंबे संघर्ष का हिस्सा रहे हैं। आज मुद्दे अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन शिक्षक समाज एक ही है।

इस समय व्याख्याता वर्ग के कई शिक्षक पुराने शिक्षकों के साथ खड़े दिखाई दे रहे है। कई मोर्चो पर वे खुद भी संघर्ष कर रहे है..। पुराने शिक्षकों का साथ छोड़ना उनके लिए भी आसान नहीं है, क्योंकि आज का शिक्षक आंदोलन पुराने संघर्षो से ही आगे बढ़ा है..।
ऐसे समय में अगर कोई नया संगठन बनकर पुराने शिक्षकों के संविलियन को चुनौती देने की बात करता है या टीईटी के नाम पर शिक्षक को शिक्षक के सामने खड़ा करता है तो चिंता होना स्वाभाविक है कि आखिर इसका फायदा किसे होगा..?

हो सकता है शिक्षक समाज को बांटने की कोई योजना किसी नए शिक्षक या संगठन की न हो..! हो सकता है कुछ लोगों की अपनी महत्वाकांक्षा या संगठन को बड़ा बनाने की कोशिश में ऐसा माहौल बन रहा हो..। यह भी संभव है कि कोई दूसरी ताकत शिक्षकों को उनके मुख्य मुद्दों से भटकाने के लिए कुछ लोगों को आगे कर रही हो..! लेकिन परिणाम क्या होगा..? शिक्षक अलग-अलग खेमों में बंटेंगे और उनकी सामूहिक ताकत कमजोर होगी…।

अंग्रेजों ने भारत में शासन करते समय यहां के राजाओं और रियासतों के बीच मौजूद मतभेदों का फायदा उठाया। एक को दूसरे के सामने खड़ा किया और अलग-अलग हितों को बढ़ावा दिया..। इतिहास में इसे फूट डालो और शासन करो की नीति के रूप में जाना जाता है..! आज किसी शिक्षक या संगठन को अंग्रेज कहना उचित नहीं होगा। लेकिन इतिहास यह जरूर बताता है कि किसी बड़े समूह को कमजोर करने के लिए उसके भीतर के मतभेदों को बढ़ाना कितना आसान होता है..।

इतिहास में इसका दूसरा पहलू भी हमारे सामने है। आजादी के समय भारत में पांच सौ से अधिक देशी रियासतें थीं। सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन ने इन रियासतों को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अगर यह एकीकरण नहीं हुआ होता तो संभव है कि आज भारत का राजनीतिक नक्शा ऐसा नहीं होता जैसा हम देखते हैं। अलग-अलग रियासतें अपने अलग हितों और शासन व्यवस्था के साथ खड़ी होती..।

शिक्षक समाज में भी आज अलग-अलग वर्ग दिखाई दे रहे हैं। 2010 से पहले नियुक्त शिक्षक हैं। बाद में भर्ती हुए शिक्षक हैं। 2019 और 2021 में भर्ती हुए शिक्षक हैं। इनमें सहायक शिक्षक, शिक्षक और व्याख्याता हैं। टीईटी पास शिक्षक हैं और टीईटी से प्रभावित शिक्षक हैं।

सबकी अपनी परेशानी है, सबसे मुद्दे अलग भी है। लेकिन साझा परेशानी भी कम नहीं है। वेतन विसंगति का मुद्दा है। पुरानी पेंशन में पूर्व सेवा की गणना का मुद्दा है। भर्ती और पदोन्नति नियमों की विसंगतियां हैं। बीएड ब्रिज कोर्स की जरूरत है। सेवा सुरक्षा का मुद्दा है। शिक्षक से व्याख्याता और व्याख्याता से प्राचार्य पदोन्नति का मुद्दा है। वेतनमान का मुद्दा है। युक्तियुक्तकरण है इनमें से कोई भी मुद्दा दूसरे शिक्षक के खिलाफ खड़े होकर हल नहीं होगा..!

शिक्षा कर्मी आंदोलन के करीब तीन दशक के इतिहास में एक से बढ़कर एक संघर्ष करने वाले लोग रहे हैं। कुछ सामने रहे, कुछ पीछे रहकर काम करते रहे। कुछ सड़क पर उतरे और कुछ अधिकारियों से बातचीत की मेज पर बैठे। सबकी भूमिका अलग थी, लेकिन लड़ाई एक बड़े शिक्षक समाज की थी।

आज वही शिक्षक समाज एक नए मोड़ पर है। टीईटी पास शिक्षक कह रहा है कि उसका पदोन्नति का अधिकार सुरक्षित रहे। टीईटी से प्रभावित शिक्षक कह रहा है कि उसकी नौकरी सुरक्षित रहे। दोनों बातें एक साथ कैसे सुरक्षित रहें, इसका रास्ता सरकार और विभाग को निकालना होगा। शिक्षक संगठनों का काम भी रास्ता तलाशना होना चाहिए, एक-दूसरे को हराने की तैयारी करना नहीं।

किसी संगठन के पास कानूनी रास्ता अपनाने का अधिकार है। अदालत में जाने का अधिकार भी है। लेकिन अदालत जाने से पहले यह सोचना भी जरूरी है कि जिस व्यवस्था को चुनौती दी जा रही है, उसका असर उन हजारों शिक्षकों और उनके परिवारों पर क्या पड़ेगा, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इसी व्यवस्था में सेवा करते हुए गुजार दिया है..!

आज कोई सरदार पटेल और वी.पी. मेनन सामने नहीं है, जो सबको एक जगह बैठाकर समझा सके कि अलग-अलग होकर ताकत कम होती है और साथ रहकर ताकत बढ़ती है। शिक्षक समाज को यह बात खुद समझनी होगी।

टीईटी पास शिक्षक का अधिकार भी सुरक्षित रहे और टीईटी से प्रभावित शिक्षक की सेवा भी सुरक्षित रहे। पुराने शिक्षक की चिंता भी सुनी जाए और नए शिक्षक की उम्मीद भी बनी रहे। इसके लिए सरकार को ऐसी व्यवस्था तलाशनी होगी जिसमें पात्रता, वरिष्ठता, अनुभव और सेवा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सके..! यही रास्ता है। वरना टीईटी की लड़ाई धीरे-धीरे शिक्षक बनाम शिक्षक की लड़ाई बन जाएगी..। फिर बात टीईटी तक सीमित नहीं रहेगी। शिक्षक समाज के बंटने का फायदा आखिर किसे होगा, यह सोचने का समय भी यही है..!