छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने बेटियों के संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि केवल वैवाहिक स्थिति या तलाक के कानूनी दस्तावेजों की अनुपलब्धता के आधार पर किसी बेटी को उसके पिता की मृत्यु के बाद मिलने वाली अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि बेटी चाहे विवाहित हो या तलाकशुदा, उसे अनुकंपा नियुक्ति के विचार से बाहर रखना न्यायसंगत नहीं है। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने जल संसाधन विभाग द्वारा एक महिला याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया है और विभाग को 40 दिनों के भीतर नए सिरे से विचार करने की समय-सीमा तय की है।

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यह मामला याचिकाकर्ता तीजिया बाई यादव से जुड़ा है, जिनके पिता स्व. पिल्लू राम यादव जल संसाधन विभाग में चौकीदार के रूप में कार्यरत थे। सेवा काल के दौरान ही 26 अगस्त 2024 को उनका आकस्मिक निधन हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद तीजिया बाई ने विभाग के समक्ष नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था।

हालांकि, विभाग के सक्षम अधिकारियों ने उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता ने आवेदन के साथ तलाक से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज संलग्न नहीं किए हैं। विभाग के इस आदेश के विरुद्ध तीजिया बाई ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एफएस खरे ने तर्क दिया कि अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता के लिए केवल वैवाहिक स्थिति को पैमाना बनाना गलत है। उन्होंने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के ही एक पुराने नजीर (फैसले) का हवाला देते हुए बताया कि अदालत ने पहले भी विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति के दायरे से बाहर रखने वाली नीति को असंवैधानिक करार दिया था।

अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हुए केवल लिंग या विवाह के आधार पर किसी को रोजगार के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से उपस्थित उप महाधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि यह मामला हाई कोर्ट द्वारा वर्ष 2015 में दिए गए पूर्व निर्णय के तहत आता है। विभाग ने भले ही मौजूदा नीति और दस्तावेजों की कमी के आधार पर आवेदन निरस्त किया था, लेकिन कानूनी रूप से यह मुद्दा पहले ही तय हो चुका है कि विवाहित बेटी को भी अनुकंपा नियुक्ति का समान अधिकार प्राप्त है।

जस्टिस बीडी गुरु ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु सेवा के दौरान हुई थी, इसलिए अनुकंपा नियुक्ति पर विचार करना विभाग की जिम्मेदारी है। केवल तलाक के कागजात पेश न करने के तकनीकी आधार पर दावे को खारिज करना अनुचित है। हाई कोर्ट ने विभाग को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि प्रमाणित आदेश की प्रति मिलने के 40 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के आवेदन पर फिर से विचार कर उचित निर्णय लिया जाए।