बलरामपुर (पृथ्वीलाल केशरी)… सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के दावों के बीच राजपुर क्षेत्र के धंधापुर में शिक्षा व्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। हाईस्कूल का पुराना भवन जर्जर है, इसलिए विद्यार्थियों को मिडिल स्कूल में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। जगह की कमी ऐसी कि 45 मिनट की कक्षा महज 30 मिनट में पूरी कराने की नौबत आ गई है। दूसरी ओर, करीब 16 लाख रुपये की लागत से बन रहे हाईस्कूल के अतिरिक्त भवन की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। पिलर और फर्श की ढलाई में घटिया सामग्री इस्तेमाल करने के आरोप हैं। वहीं, गांव का मिडिल स्कूल करीब 25 साल से अपने भवन के इंतजार में है। सवाल सीधा है—जब स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं ही नहीं हैं, तो बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

16 लाख का निर्माण, गुणवत्ता पर सवाल

धंधापुर हाईस्कूल के अतिरिक्त भवन का निर्माण विद्यार्थियों को बेहतर सुविधा देने के लिए कराया जा रहा है, लेकिन निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर स्थानीय स्तर पर नाराजगी है। आरोप है कि पिलर और फर्श की ढलाई में निर्धारित मानकों की अनदेखी की जा रही है। फर्श में बालू और गिट्टी डालने के बाद ऊपर से सीमेंट का घोल डालकर काम किए जाने की शिकायत भी सामने आई है। पंचायत पदाधिकारियों की आपत्ति के बावजूद निर्माण में सुधार नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।

निर्माण से जुड़े लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिलने की चर्चा भी है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। वजूद इसके, सरकारी धन से बन रहे भवन की गुणवत्ता पर सवाल उठना अपने आप में गंभीर है। जिस भवन में भविष्य में बच्चे पढ़ेंगे, उसकी मजबूती को लेकर ही सवाल खड़े हों, तो निर्माण की निगरानी व्यवस्था पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

जर्जर भवन की सजा भुगत रहे विद्यार्थी

हाईस्कूल का पुराना भवन जर्जर होने के कारण विद्यार्थियों को मिडिल स्कूल में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। जगह की कमी के चलते कक्षाओं का समय घटने की बात सामने आई है। सामान्य तौर पर 45 मिनट चलने वाली कक्षा अब करीब 30 मिनट में पूरी कराई जा रही है। यानी हर कक्षा में 15 मिनट की कटौती। लगातार ऐसी स्थिति बनी रहने पर विद्यार्थियों को पढ़ाने, उनकी शंकाओं का समाधान करने और पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए मिलने वाला समय प्रभावित होना तय है।

एक ओर बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त कक्ष उपलब्ध नहीं हैं, दूसरी ओर नए भवन के निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को आखिर कब तक इस अव्यवस्था के बीच पढ़ना पड़ेगा? जर्जर भवन और सीमित कक्षाओं की समस्या के बीच शिक्षा व्यवस्था का वास्तविक हाल सरकारी दावों से अलग नजर आ रहा है।

25 साल से मिडिल स्कूल को अपना भवन नहीं

धंधापुर में मिडिल स्कूल करीब 25 वर्षों से संचालित है, लेकिन अब तक उसे अपना भवन नहीं मिल पाया है। विद्यालय अतिरिक्त कक्षों में चल रहा है। हाईस्कूल के विद्यार्थियों को जगह देने के कारण मिडिल स्कूल की कक्षाएं दूसरी पाली में लगाई जा रही हैं। इस व्यवस्था का दबाव दोनों विद्यालयों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।

एक गांव में दो विद्यालयों की यह स्थिति व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करती है। हाईस्कूल का भवन जर्जर होने से विद्यार्थी दूसरे विद्यालय में पढ़ रहे हैं और मिडिल स्कूल के बच्चे भी अपने विद्यालय की स्वतंत्र व्यवस्था से वंचित हैं। करीब ढाई दशक का समय कम नहीं होता, लेकिन इतने लंबे अंतराल में भी मिडिल स्कूल के लिए अपना भवन उपलब्ध नहीं हो पाना जिम्मेदार तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।

बच्चों की पढ़ाई प्रभावित, जवाबदेही किसकी?

धंधापुर में तस्वीर साफ है—पुराना हाईस्कूल भवन जर्जर, मिडिल स्कूल के पास अपना भवन नहीं और 16 लाख रुपये की लागत से बन रहे नए भवन के निर्माण पर भी सवाल। इन तीनों स्थितियों का असर सीधे विद्यार्थियों की पढ़ाई और स्कूलों की व्यवस्था पर पड़ रहा है। निर्माण में कथित गड़बड़ी के आरोपों की तकनीकी पुष्टि होना बाकी है, लेकिन भवनों की कमी और कक्षाओं के समय में कटौती की स्थिति शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी समस्याओं को उजागर करती है।

धंधापुर के स्कूलों की बदहाली अब केवल भवनों की कमी का मामला नहीं रह गई है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां बच्चों को पर्याप्त कक्ष नहीं मिल रहे, पढ़ाई का समय घट रहा है और नए निर्माण की गुणवत्ता भी विवादों में है। सरकारी धन खर्च होने के बाद भी यदि बच्चों को सुरक्षित भवन और पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल रहा, तो विकास के इन दावों का लाभ आखिर किसे मिल रहा है?