मान्यता शून्य, फीस वसूली जारी—रसूख के बीच सवालों में मॉडर्न एंड मॉरल पब्लिक स्कूल, प्रशासन मौन
बिना मान्यता संचालन, फीस पर सवाल और प्रशासनिक चुप्पी ने बढ़ाई गंभीरता

बिलासपुर.. जिले में निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है, लेकिन तिफरा स्थित मॉडर्न एंड मॉरल पब्लिक स्कूल का मामला इन मूलभूत अपेक्षाओं को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। यहां अभिभावकों के आरोप केवल फीस वसूली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संस्थान की वैधता, पंजीयन और प्रशासनिक निगरानी तक फैले हुए हैं।
इस पूरे प्रकरण ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं, और क्या प्रभावशाली संस्थानों के मामले में कार्रवाई का पैमाना अलग हो जाता है। अभिभावकों का कहना है कि लंबे समय से चल रही इन अनियमितताओं के बावजूद जिम्मेदार विभागों की निष्क्रियता ने स्थिति को और चिंताजनक बना दिया है।
मान्यता खत्म, फिर भी कक्षाएं जारी
मामले का सबसे गंभीर पहलू स्कूल की मान्यता से जुड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार, इस संस्थान को पहले नर्सरी से 8वीं तक की मान्यता प्राप्त थी, लेकिन अवधि समाप्त होने के बाद उसका नवीनीकरण नहीं कराया गया। इसके बावजूद स्कूल का संचालन जारी रखा गया और आगे बढ़ते हुए 9वीं से 12वीं तक की कक्षाएं भी शुरू कर दी गईं। आरोप है कि इन उच्च कक्षाओं के लिए आवेदन तक नहीं किया गया। इस स्थिति में वर्तमान में नर्सरी से बारहवीं तक कक्षाएं बिना वैध मान्यता के संचालित होने की बात कही जा रही है, जो नियमों की गंभीर अनदेखी की ओर इशारा करती है।
फीस वसूली पर उठते सवाल
बिलासपुर के तिफरा स्थित इस निजी स्कूल को लेकर अभिभावकों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। आरोप है कि फीस वसूली की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और राशि को अलग-अलग मदों में स्पष्ट करने के बजाय एकमुश्त तरीके से तीन से चार किश्तों में लिया जा रहा है। अभिभावकों का यह भी आरोप है कि फीस तय करने के लिए आवश्यक समिति का गठन नहीं किया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नियमानुसार (छत्तीसगढ़ फीस विनियमन अधिनियम, 2020) फीस निर्धारण और पारदर्शिता के स्पष्ट प्रावधान हैं, लेकिन अभिभावकों का कहना है कि यहां उन्हें यह तक नहीं बताया जाता कि वे किस मद में कितना भुगतान कर रहे हैं। कई मामलों में रसीद न दिए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है।
छोटे बच्चों पर भी शुल्क का बोझ
अभिभावकों का कहना है कि नर्सरी स्तर के बच्चों से भी लैब और लाइब्रेरी शुल्क वसूला जा रहा है, जबकि इन सुविधाओं का वास्तविक उपयोग नहीं होता। इसी तरह, खेल गतिविधियों में भाग न लेने वाले छात्रों से भी स्पोर्ट्स फीस ली जा रही है। परिवहन सुविधा लेने वाले विद्यार्थियों से अलग से भारी शुल्क वसूले जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
पारदर्शिता पर सवाल
फीस संरचना, उसकी वृद्धि और विभिन्न मदों की जानकारी को सार्वजनिक सूचना पटल पर प्रदर्शित नहीं किए जाने का मुद्दा भी उठ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल परिसर में फीस से जुड़ी कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती, जिससे पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ जाती है और जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है।
CBSE एफिलिएशन पर उठते प्रश्न
स्कूल द्वारा सीबीएसई एफिलिएशन का दावा भी किया जा रहा है। हालांकि, जब मूल मान्यता की स्थिति ही स्पष्ट नहीं है, तब इस प्रकार का दावा अपने आप में सवाल खड़े करता है। जानकार इसे गंभीर विसंगति मानते हैं और इसकी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर देते हैं।
डायरेक्टर का बयान और रसूख की चर्चा
स्कूल के डायरेक्टर डॉ. प्रेमरंजन सिंह ने आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार को वास्तविक स्थिति की समझ नहीं है और कई आदेश ऐसे समय पर जारी किए जाते हैं जिनका पालन करना संभव नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि यह शहर के एक रसूखदार व्यक्ति का स्कूल है और उनके रहते संस्थान को किसी प्रकार का खतरा नहीं है। उनके इस बयान ने पूरे मामले को और अधिक चर्चा में ला दिया है और संस्थान के प्रभाव को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में शिक्षा विभाग की भूमिका भी कठघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल की मान्यता समाप्त होने और लगातार शिकायतों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। जब एक संस्थान पर बिना मान्यता के संचालन जैसे गंभीर आरोप हों और फिर भी कार्रवाई न हो, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पूरे तंत्र की निष्क्रियता को दर्शाता है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विभाग जानबूझकर अनदेखी कर रहा है या प्रभावशाली लोगों के कारण कार्रवाई से बचा जा रहा है।
अभिभावकों की मांग
अभिभावकों ने जिला शिक्षा विभाग और संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि स्कूल की मान्यता, पंजीयन और फीस वसूली की प्रक्रिया की तत्काल जांच की जाए। उनका कहना है कि यदि अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि शिक्षा के नाम पर किसी भी प्रकार की मनमानी और आर्थिक बोझ पर रोक लगाई जा सके।
पारदर्शिता और जवाबदेही
यह मामला अब केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही का परीक्षण बन चुका है। जब नियमों के पालन को लेकर इतने गंभीर सवाल उठ रहे हों और कार्रवाई का अभाव दिखे, तो यह स्वाभाविक है कि अभिभावक और समाज दोनों ही स्पष्ट जवाब और ठोस कदम की अपेक्षा करें।





