हाईकोर्ट ने कलेक्टर को दिया आदेश, 30 दिनों के भीतर खरीदें किसान का बकाया 84 क्विंटल धान

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सक्ती जिले के एक किसान को बड़ी राहत दी है। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने सक्ती कलेक्टर और संबंधित सहकारी समिति को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता किसान का बकाया 84 क्विंटल धान 30 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से खरीदा जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि धान की कटाई कानूनी और वैध तरीके से हुई है, तो तकनीकी आधार पर किसान की फसल खरीदने से इनकार करना उचित नहीं है। इस फैसले से उन किसानों को बड़ी उम्मीद मिली है जो स्टॉक सत्यापन और अन्य प्रशासनिक अड़चनों के कारण अपनी उपज बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
पूरा मामला सक्ती जिले के ग्राम हसौद का है, जहां रहने वाले किसान लक्ष्मण कुमार चंद्रा ने खरीफ सीजन 2025-26 के लिए अपनी 3.7800 हेक्टेयर कृषि भूमि का पंजीकरण किसान पोर्टल पर कराया था।
लक्ष्मण ने इस जमीन पर अधिया (बटाई) के आधार पर खेती की थी। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, उसे कुल 196 क्विंटल धान बेचने के लिए सहकारी समिति हसौद द्वारा टोकन भी जारी किया गया था। किसान ने इस कोटे में से 111.20 क्विंटल धान तो बेच दिया, लेकिन शेष 84 क्विंटल धान की खरीदी के समय विवाद खड़ा हो गया।
विवाद की मुख्य वजह 20 जनवरी को किया गया भौतिक सत्यापन (स्टॉक जांच) बना। दरअसल, बटाई पर खेती होने के कारण कटाई के बाद शेष 84 क्विंटल धान बटाईदार के घर में भंडारित कर रखा गया था।
जब प्रशासनिक टीम जांच के लिए पहुंची, तो यह धान सीधे याचिकाकर्ता के कब्जे या निवास पर नहीं मिला। इसी आधार पर समिति प्रबंधक ने धान खरीदने से साफ इनकार कर दिया। अपनी मेहनत की फसल न बिकने से परेशान किसान ने अंततः अधिवक्ता योगेश कुमार चंद्रा के माध्यम से हाईकोर्ट की शरण ली।
याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि किसान का नाम पोर्टल पर पंजीकृत है और उसके पास वैध टोकन भी था। धान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से उसे बटाईदार के घर रखा गया था, जिसे प्रशासनिक अधिकारियों ने गलत समझा। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि धान की कटाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई थी। कोर्ट ने कलेक्टर सक्ती अमृत विकास टोपनो, हसौद मंडी और सहकारी समिति को निर्देशित किया कि वे किसान के इस 84 क्विंटल धान को तत्काल उठाएं और भुगतान सुनिश्चित करें। 30 दिनों की समय-सीमा तय करते हुए अदालत ने इस याचिका को निराकृत कर दिया है।




