बिलासपुर/छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर पुलिस द्वारा एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत की गई एक कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) से व्यक्तिगत हलफनामे के साथ जवाब तलब किया है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने पुलिस की जांच प्रक्रिया में एक बड़ी प्रक्रियात्मक खामी को रेखांकित किया है। कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए पूछा है कि जिस सहायक उपनिरीक्षक (ASI) ने मामले में एफआईआर दर्ज की, उसी अधिकारी को इस केस का जांच अधिकारी (IO) कैसे नियुक्त कर दिया गया?

यह मामला बिलासपुर के सरकंडा थाना क्षेत्र का है, जहां पुलिस ने बंधवापारा में एक महिला के घर से 2925 प्रतिबंधित क्लोनाजेपाम (रिवोट्रिल) टैबलेट बरामद करने का दावा किया था। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद महिला पिछले सात महीनों से जेल में बंद है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि इस पूरे मामले में साजिश की बू आ रही है। महिला के भाई का आरोप है कि उसके बहनोई और सरकंडा पुलिस के एएसआई शैलेंद्र सिंह ने मिलीभगत कर उसकी बहन को झूठा फंसाया है।

परिवार का दावा है कि जिस बैग से दवाएं मिलीं, वह महिला के पास से नहीं, बल्कि घर की छत पर मिला था, जिसे 14 साल का एक बच्चा पतंग उड़ाते समय वहां देख पाया था।

मामले में मानवीय संवेदनाओं और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। कोर्ट को बताया गया कि पुलिस ने कथित तौर पर 14 साल के बच्चे को भी थाने में करीब 10 घंटे तक बैठाकर रखा, जबकि उसके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी।

याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि इस बात की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कि दवाओं से भरा बैग छत तक आखिर कैसे पहुंचा और उन दवाओं का वास्तविक स्रोत क्या है। साथ ही, बच्चे के मोबाइल की फॉरेंसिक जांच कराने की भी पेशकश की गई है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उसने दवाओं के बारे में जानकारी कब और कैसे जुटाई थी।

हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए, बल्कि एएसआई शैलेंद्र सिंह के पिछले आचरण और सर्विस रिकॉर्ड की जानकारी भी पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एफआईआर दर्ज करने वाला ही जांच अधिकारी बन जाता है, तो जांच की निष्पक्षता प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी, जिसमें डीजीपी द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले शपथपत्र के आधार पर कोर्ट आगे की दिशा तय करेगा।