बिलासपुर… सरकारी जमीन पर कब्जा कर पक्के निर्माण खड़े करना और वहां व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करना अतिक्रमणकारियों को भारी पड़ गया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेमेतरा जिले के ग्राम खैरा में सरकारी जमीन पर बने ढाबे, टायर रिपेयरिंग दुकान और हेयर कटिंग सैलून को हटाने के राजस्व अधिकारियों के आदेश को बरकरार रखा है। हालांकि, तहसीलदार के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लगाए गए 25 हजार रुपये के जुर्माने को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने जुर्माने के निर्धारण के लिए मामला सक्षम अनुविभागीय अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया है।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने अवध वर्मा और संतोष वर्मा की याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। मामला बेमेतरा जिले की नांदघाट तहसील के ग्राम खैरा का है। यहां खसरा नंबर 138 की करीब 2100 वर्गफुट सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की शिकायत संतोष बारले ने की थी। शिकायत के मुताबिक, जमीन पर पक्का निर्माण कर किसान ढाबा, टायर रिपेयरिंग दुकान और मौली हेयर कटिंग सैलून संचालित किए जा रहे थे। वाहनों की पार्किंग के लिए भी सरकारी जमीन का इस्तेमाल हो रहा था। इससे शिकायतकर्ता को अपनी निजी कृषि भूमि तक पहुंचने और खेती-किसानी करने में परेशानी हो रही थी।

शिकायत पर तहसीलदार ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत कार्रवाई करते हुए अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। साथ ही जियो मोबाइल टावर हटाने के लिए संबंधित अधिकारियों को सूचना देने के निर्देश दिए थे। तहसीलदार ने दोनों याचिकाकर्ताओं पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुनील कुमार सोनी ने दलील दी कि धारा 248 के तहत तहसीलदार को अधिकतम 10 हजार रुपये तक जुर्माना लगाने का अधिकार है। इससे अधिक जुर्माना लगाने का अधिकार अनुविभागीय अधिकारी को है। उन्होंने कार्रवाई से पहले उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिए जाने का मुद्दा भी उठाया। राज्य की ओर से अधिवक्ता अन्वय तिवारी ने पक्ष रखा।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ताओं को अपना पक्ष रखने और पटवारी से जिरह करने का अवसर दिया गया था। उन्होंने खुद ही जिरह से इनकार कर लिखित तर्क प्रस्तुत किए थे। ऐसे में सुनवाई का अवसर नहीं मिलने और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड, पटवारी की रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे को प्रमाणित माना। याचिकाकर्ता भी जमीन पर कब्जे का कोई वैधानिक अधिकार साबित नहीं कर सके। इसलिए अतिक्रमण हटाने और बेदखली के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला।

एकलपीठ ने 31 मई 2022 के बेदखली आदेश को बरकरार रखते हुए 25 हजार रुपये का जुर्माना निरस्त कर दिया। जुर्माने की राशि तय करने का मामला सक्षम अनुविभागीय अधिकारी को भेजते हुए निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर देकर कानून के मुताबिक निर्णय लें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अब तक अतिक्रमण नहीं हटाया गया है तो तहसीलदार तत्काल कार्रवाई करें।