बिलासपुर… महिला शिक्षिका से छेड़छाड़ और मारपीट के मामले में न्यायालय से सश्रम कारावास की सजा पाने वाले शिक्षक विवेक गुप्ता के खिलाफ विभागीय कार्रवाई अब तक स्पष्ट नहीं होने से शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल और गहरे हो गए हैं। 19 अक्टूबर को मामला सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने कठोर कार्रवाई का भरोसा दिया था, लेकिन तीन दिन गुजरने के बावजूद संयुक्त संचालक कार्यालय का रुख कार्रवाई से ज्यादा प्रक्रिया और संभावनाओं के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। संयुक्त संचालक अश्वनी भारद्वाज का यह कहना कि अब मामले को देखकर आगे की कार्रवाई करेंगे, इस पूरे प्रकरण में विभाग की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।

मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि यह केवल किसी शिक्षक के खिलाफ शिकायत का नहीं, बल्कि न्यायालय से सजा सुनाए जाने के बाद सरकारी सेवा में विभागीय कार्रवाई का है। जब प्रकरण पुलिस से होते हुए न्यायालय तक पहुंचा, सुनवाई हुई और सजा का फैसला भी आ गया, तब शिक्षा विभाग को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए आखिर और कितनी जानकारी की जरूरत है? क्या न्यायालय के फैसले के बाद भी विभागीय कार्रवाई का रास्ता केवल अधिकारियों की समीक्षा और पत्राचार के भरोसे खुलता है?

कार्रवाई का भरोसा, अब भी फैसला स्पष्ट नहीं

19 अक्टूबर को इस मामले में खबर प्रकाशित होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी संदीप पांडे ने कहा था कि विभाग को प्रकरण की जानकारी मिल गई है और शिक्षक के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी। उन्होंने बर्खास्तगी की कार्रवाई की संभावना भी जताई थी।

इसके बावजूद अब तक कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने पर संयुक्त संचालक अश्वनी भारद्वाज ने कहा कि उन्हें मामले की जानकारी अब मिली है और वे आगे की कार्रवाई करेंगे। उनके जवाब में ‘अगर’ शब्द का इस्तेमाल भी सवाल खड़े करता है। न्यायालय से सजा सुनाए जाने के बाद भी यदि जिम्मेदार अधिकारी मामले को पहले देखने और फिर कार्रवाई करने की बात कहें, तो सवाल उठता है कि विभाग अब तक किस बात को लेकर अनिश्चित है।

संयुक्त संचालक का ‘अगर’ किस बात का?

विभागीय कार्रवाई की स्थिति पूछे जाने पर संयुक्त संचालक का जवाब तत्काल और स्पष्ट निर्णय की जगह मामले को देखने के बाद आगे बढ़ने की बात तक सीमित रहा। न्यायालय के फैसले और सजा की जानकारी सामने आने के बाद अब मुख्य सवाल यह है कि लागू सेवा नियमों के तहत विभाग कौन-सा कदम उठा रहा है और कार्रवाई की समयसीमा क्या है।

अधिकारी का यह जवाब अपने आप में किसी गलत मंशा का प्रमाण नहीं है। लेकिन तीन दिन पहले मामला सार्वजनिक होने, जिला शिक्षा अधिकारी के कठोर कार्रवाई के भरोसे और अब तक स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आने के बीच यह रुख विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल जरूर खड़े करता है। विभाग को बताना चाहिए कि शिक्षक के विरुद्ध किस नियम के तहत कार्रवाई होगी, आदेश जारी करने की जिम्मेदारी किस स्तर पर है और अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

एक महीने तक विभाग क्या करता रहा?

जानकारी के मुताबिक, तखतपुर विकासखंड के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बेलमुंडी में पदस्थ शिक्षक विवेक गुप्ता पर महिला शिक्षिका से छेड़छाड़ और मारपीट का मामला करीब एक महीने पहले सामने आया था। शिक्षिका की शिकायत पर पुलिस ने अपराध दर्ज किया। इसके बाद मामला न्यायालय पहुंचा और शिक्षक को सजा सुनाई गई।

अब सवाल यह है कि शिकायत दर्ज होने से लेकर न्यायालय के फैसले तक विभाग की भूमिका क्या रही? क्या विभाग को मामले की जानकारी समय रहते मिल गई थी? यदि जानकारी थी, तो उस पर क्या कार्रवाई की गई? और यदि जानकारी नहीं थी, तो गंभीर शिकायतों की निगरानी और विभागीय समन्वय की व्यवस्था की जवाबदेही किसकी है?

महिला कर्मचारी से जुड़े इतने गंभीर मामले में विभाग की भूमिका केवल न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा करने तक सीमित नहीं रह सकती। यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायत मिलने के बाद विभाग ने अपने स्तर पर क्या किया और न्यायालय के फैसले की जानकारी मिलने पर अब तक कौन-सी प्रक्रिया शुरू की गई है।

दोषसिद्धि के बाद सेवा नियम क्या कहते हैं?

छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 19 में आपराधिक दोषसिद्धि की स्थिति में कुछ परिस्थितियों में विशेष प्रक्रिया के तहत दंड देने का प्रावधान है। संबंधित शिक्षक के मामले में अंतिम विभागीय निर्णय न्यायालय के फैसले, सजा के स्वरूप और लागू सेवा नियमों के अनुसार लिया जाना है।

शिक्षिकाएं सुरक्षित नहीं, सवाल उठना स्वाभाविक

शिक्षा विभाग का दायित्व केवल विद्यालयों में पढ़ाई संचालित करना नहीं, बल्कि अपने कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और जवाबदेह कार्य वातावरण सुनिश्चित करना भी है। जब महिला शिक्षिका से जुड़े गंभीर मामले में न्यायालय सजा सुना चुका हो और इसके बाद भी विभागीय कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट न हो, तो कर्मचारियों का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है।

अब जिला शिक्षा विभाग और संयुक्त संचालक कार्यालय के सामने सीधे सवाल हैं—शिक्षक विवेक गुप्ता के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई कब तक होगी और इस मामले में विभागीय स्तर पर हुई देरी की जिम्मेदारी तय की जाएगी या नहीं? जिला शिक्षा अधिकारी के कठोर कार्रवाई के भरोसे के बाद भी यदि स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो विभाग की जवाबदेही पर सवाल उठना लाजिमी है। अब जरूरत आश्वासन की नहीं, बल्कि समयबद्ध और नियमसम्मत कार्रवाई की है।