CG Highcourt Decision/छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति को स्पष्ट करते हुए 24 साल पुराने एक रिश्वत मामले में फैसला सुनाया है। जस्टिस एन.के. व्यास की एकल पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए एक लोक सेवक की अपील को खारिज कर दिया है।

अदालत ने निचली अदालत द्वारा साल 2002 में सुनाई गई सजा के आदेश को पूरी तरह सही माना है। यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि मुख्य आरोपी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और कानूनी वारिस इस अदालती लड़ाई को लड़ रहे थे, लेकिन हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर दोषी को किसी भी तरह की राहत देने से इनकार कर दिया।

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क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2000 का है, जब शिकायतकर्ता बालमुकुंद पटेल ने लोकायुक्त पुलिस, रायपुर में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, तत्कालीन लोक सेवक लक्ष्मण दास लहरे ने बालमुकुंद का चिकित्सा अवकाश स्वीकृत करने और उनके कई महीनों के रुके हुए वेतन को जारी करने के बदले 10 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी।

इसमें से 5 हजार रुपये तत्काल और शेष राशि काम होने के बाद देनी तय हुई थी। लोकायुक्त पुलिस ने जाल बिछाते हुए 29 फरवरी 2000 को ट्रैप की कार्रवाई की और आरोपी को रंगे हाथों पकड़ा। तलाशी के दौरान आरोपी की जेब से 4 हजार रुपये की रिश्वत राशि बरामद हुई थी।

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निचली अदालत ने सुनाई थी कड़ी सजा
CG Highcourt Decision/इस मामले की सुनवाई के बाद रायपुर के विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) ने 3 मई 2002 को अपना फैसला सुनाया था। अदालत ने लक्ष्मण दास लहरे को धारा 7 के तहत 1 वर्ष और धारा 13(1)(d) के साथ धारा 13(2) के तहत 3 वर्ष के सश्रम कारावास और जुर्माने से दंडित किया था। इसी फैसले को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अपील लंबित रहने के दौरान ही 22 जून 2014 को आरोपी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके परिजनों ने इस उम्मीद में केस जारी रखा कि शायद दाग धुल जाए, लेकिन साक्ष्यों ने उनका साथ नहीं दिया।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एन.के. व्यास की बेंच ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘नीरज दत्ता बनाम दिल्ली सरकार’ जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में ‘रिश्वत की मांग’ और ‘उसे स्वीकार करना’ प्रत्यक्ष या परिधीय साक्ष्यों से साबित होना जरूरी है। इस मामले में लोकायुक्त की कार्रवाई और बरामदगी ने जुर्म को पूरी तरह साबित किया। अदालत ने कहा कि आरोपी इस बात का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका कि उसके पास वे ‘दागी नोट’ कहां से आए।

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साक्ष्यों के सामने दलीलें हुईं फेल
CG Highcourt Decision/हाईकोर्ट ने अपील में उठाए गए सभी कानूनी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालत का निर्णय कानून की कसौटी पर पूरी तरह खरा है। कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि भ्रष्टाचार समाज के लिए एक कैंसर की तरह है और साक्ष्य मौजूद होने पर दोषी को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा, चाहे मामला कितना ही पुराना क्यों न हो।